ram bhakt kambar

भगवान् श्रीराम का कथामृत-रसास्वादन सर्वथा वैदिक होते हुए भी इतनी सीमा तक लोकगत हो चला है कि आपका जीवन भक्तरूप श्रीराम का गुण गाये बिना शान्ति की वास्तविक अनुभूति ही नहीं कर सकता। गंगा, यमुना नर्मदा, माही और कृष्णा, कावेरी तथा गोदावरी के पवित्र तट के मानवों ने समय-समय पर भगवान् श्रीराम के पवित्र चरित्र का जो बखान किया है, वह भारतीय संस्कृति की अविच्छिन्नता अथवा एकता का साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रतीक है।

महाकवि कम्बर् श्रीराम के यशोगायक थे। जिस समय दसवीं और ग्यारवीं सदी के दक्षिण भारत में धार्मिक पुनरूत्थान हो रहा था, उनकी काब्य-भारती ने धर्म-विग्रह मर्यादा-पुरूषोत्तम भगवान् श्री राम के ऐश्वर्य को अपनाया था।

कम्बर् नवीं सदी के परम रामभक्त और यशस्वी कवि थे। चोळराज्य के तिरूवळन्दूर नगर में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम आदवन् था। वे राजपुरोहित थे। बचपन से ही कम्बर् में श्रीराम के प्रति दृढ़ अनुराग था, अडिग भक्ति भी। प्रसिद्ध वैष्णव कवि और संत नम्माळवार उनके गुरू थे। कम्बर् ने गुरू की कृपा और भगवान् की भक्ति से काव्य-स्फूर्ति पाकर प्रसिद्ध काम्बरामाण की रचना की। रचना के ठीक पाँच साल बाद सन् 885 ई0 में फाल्गुन पूर्णिमा को श्रीरंगम् की साहित्य-सभा ने काम्ब रामायण को मान्यता प्रदान की उसने रामभक्त कम्बर् को कविचक्रवर्ती की उपाधि से समलंकृत किया। चोळ और चेरसम्राट् उनका बड़ा सम्मान करते थे।

राम-यश-कीर्तन की प्रतिभा बड़े भाग्य से मिलती है। उन्होंने काम्ब रामायण में आदि से अन्त तक रावण के विनाश को ही पवित्र उद्देश्य रखा है। कम्बर् ने श्रीराम के द्वारा रावण के अन्त का स्मरण काब्य के प्रत्येक महत्वपूर्ण स्थल पर कराया है। कम्बर् ने घटना वर्णन में वाल्मीकि का ही अनुसरण किया है, पर कहीं-कहीं भक्तहृदय की विलक्षण अनुभूति, अपनी विचित्र काव्य शैली और प्रतिभा के कारण अत्यन्त मौलिक हो गये हैं। चरित्र चित्रण में उन्होंने दैवीसम्पत्ति की सराहना और आसुरी-सम्पत्ति की निन्दा की है। कम्बर् ने दया, प्रेम और अहिंसा के वशाीभूत होकर अपनी रामायण में कहीं शास्त्र-नियम का उल्लंघन नहीं होने दिया है। कम्बर् परम रामभक्त, यशस्वी कवि और महान भगवदीय थे।

लेखक-अनिल यादव।

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