पट्टमहिषी सत्याभामा चित्रशाला में दर्शिका से प्रत्येक चित्र का परिचय मनोयोग से सुनती जाती थीं। सहसा वे एक चित्र के सामने रूकीं। चित्रको देखकर विस्मय-विमुग्ध वे हठात् बोलीं- ‘प्रभु के समीप बैठी हुई ये देवी कौन हैं, चित्रा? मैंने इन्हें कभी नहीं देखा था। साथ ही यह चरणों में कौन बैठा है?’

‘सच कहती हैं, महारानी! आपने इन्हें कभी नहीं देखा होगा। ये द्वारकाधीश नहीं हैं, यह तो मार्यादापुरूषोत्तम अयोध्यानरेश भगवान् श्री राम हैं और इनके वामांग में सुशोभित यह महारानी सीता हैं। इनके चरणों में अर्चना करते हुए श्री राम के अनन्य सेवक अन्जनीनन्दन हनुमान हैं।’

मैं विस्मित थी, वंशीधारी को धनुषधारी के रूप में देखकर; किंतु कितनी अभिन्नता है दोनों के रूपों में- वही गठन, वही कुण्डलों की मधुर हिलन, वही अधरों पर क्रीड़ा करती हुई वे ही राजीवनयन, वही विशाल वक्षःस्थल, वे ही अभय प्रदान करने वाले वरदहस्त कहते-कहते महारानी ध्यानावस्थित हो गयीं और उनका स्वर अवरूद्ध हो गया।

‘आप भी तो महारानी सीताकी ही अनुहार हैं। वही रूप-लावण्य, वही सुडौल अवयव, अरूण कपोल, खज्जन-से नेत्र, जगज्जननी के पदसे गौरवान्वित, उदारहृदया, अधरों पर थिरकनेवाला अपूर्व माधुर्य- सभी कुछ तो महारानी सीता के अनुरूप ही है।’ महारानी के कर्ण-कुहरों में दर्शिका के शब्द पड़े। वे चेतन हो गयीं और उन्मीलित नेत्र किये हुए सुनने लगीं। महारानी बोलीं-‘मित्या है’।

चित्रा मुस्कुरायी और बोली-‘मेरी दृष्टि से देखिये।’

‘कही भी तो संगति नहीं लगती, चित्रा! फिर विषय बदलती हुई हनुमान की ओर संकेत करती हुई सत्यभामा बोलीं-‘मारूतनन्दन का सिंदूर-वर्ण क्यों है, चित्रा!’

बड़ी सुन्दर कथा है, महारानी!’ प्रभात हो रहा था। दिनेशकी स्वर्णिम किरणें महारानी सीताके प्रकोष्ठ में प्रकाश विखेर रही थीं। महारानी सीता राघवेन्द्र सरकारकी अर्चना करके निकलीं। अन्जनीनन्दन ने चरणों में अभिवादन किया। महारानी ने आर्शीवाद दिया, ‘प्रभुके प्रेम-भाजन बनों-अन्जनेय!’ पवनसुत गद्द होकर माँके मुख की ओर निहारने लगे। उनकी माँग में सिन्दूर की लाली देखकर वे चकित रह गये और पूछ बैठे।

‘माँ! एक जिज्ञासा है।’
‘क्या!’
‘अनुचित न समझें तो कहूँ। माँग में लाली कैसी, माँ!’

‘तुम समझ सकोगे ब्रह्मचारी!’ महारानी मुस्करायीं। ‘यह नारियों के सौभाग्य का प्रतीक है। प्रभु इससे प्रसन्न होते हैं।’
‘फिर कहो, माँ! प्रभु इससे प्रसन्न होते हैं?’

‘हाँ, प्रभु इससे प्रसन्न होते हैं।’
‘प्रसन्न होते हैं, प्रसन्न होते हैं’ कहते हुए मारूति भागे।

दूसरे दिन वे प्रभु की सेवा में उपस्थित हुए। युगल-सरकार उनके रूप-वैचित्रयको देखकर हँस पड़े- यह कैसा वेष बनाया है, बजरंगी!’

‘प्रभु धृष्टता क्षमा करें। स्वभाव से चंचल कपि में अनुकरण की प्रवृत्ति होती है। बन्दनीया माँ की माँग में सिन्दूर देखकर मेरे मन में ऐसी स्फुरणा हुई कि जब माँ की इतनी-सी सिन्दूर-लालिमा से प्रभुु प्रसन्न होते हैं, तब समस्त शरीर में लगाने से तो प्रभु का असीम अनुग्रह मिल सकेगा। अतः यह चपलता दास से हो गयी है, मेरे नाथ!’ मारूतनन्दन प्रभु के चरणों में गिर गये।
भगवान् उनके भोलेपन पर मुस्किराये और अपना वरदहस्त उनके मस्तकपर रखते हुए बोले-‘मुझे तुम्हारा यह वेष विशेष रूचकर प्रतीत हो रहा है।’

‘जैसी मेरे प्रभु की इच्छा।’ हनुमान बोल उठे।
मैथिली ने भी मुस्कराते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया-

राम रसायन तुम्हाने पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।’

हनुमान का मुख प्रसन्नता से खिल उठा और वे गद्द स्वर में बोले-‘मैं धन्य हो गया, माँ! आशीर्वाद दो, जननी-

‘सीताराम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

कथा सुनकर सत्यभामा हँस पड़ी।

‘महारानी!’ चित्रा ने कहा-‘इधर आईये, आपको पवनकुमार की झाँकी दिखाऊँ।’

महारानी चित्रा। उन्होंने जिज्ञासा के स्वर में पूछा-‘चित्रा! कीर्तनरत पवनसुत के समक्ष प्रभु का मुख क्यों खुला हुआ है।’
चित्रा ने सहास्य कहा-‘बड़ी सुन्दर घटना है, महारानी!’

रात्रि का समय था। राघवेन्द्र सरकार शयन-कक्ष में थे। द्वार बंद हो गया था। कुछ समय पश्चात् अप्रत्याशित स्वर सुनकर महारानी मैथिली जाग उठीं। देखा, प्रभु को निरन्तर उबासी आ रही थी। प्रभु की व्यग्रता देखकर वे कातर हो गयीं। प्रभु की रूग्णता का समाचार विद्युद्गति से समस्त महल में फेल गया जिसने सुना, वही उसी दशा में शयन-कक्ष की ओर दौड़ा। माताएँ अपने दुलारे राम की व्यथा देखकर दुःखी हो गयीं। वे अपने सुकृत का स्मरण कर देवी-देवताओं को मनाने लगीं। सभी कुमार प्रभु की सेवा में संलग्न थे। चिचित्सकों के उपचार व्यर्थ सिद्ध हो रहे थे। उबासी का क्रम त्वरित बेग से बढ़ता ही जा रहा था। निराश मुद्र में सब

प्रभु के मुख की ओर निहार रहे थे। सहसा वातावरण में कोलाहल गूँज उठा-‘गुरूदेव आ गये!’
महर्षि वसिष्ठ को देखकर कैकेयी अम्बा रो उठीं-‘गुरूदेव! राघव को क्या हो गया? बढ़ती हुई उबासियों ने प्रसन्नता से विकसित

रहने वाले इनके मुख-कमलको व्यथा से कुम्हला दिया है। आशीर्वाद दीजिये गुरूदेव!’
सुमित्रा अम्बा ने अश्रु पोंछते हुए कहा-‘मेरा राम शीध्र स्वस्थ हो जाय।’

महर्षि मनमें प्रार्थना करने लगे-‘यह कैसा अभिनय है, नटनागर! टापकी इस अकल्पित लीला से विमाहित परिजन एवं पुरजन व्यथित हो रहे हैं, प्रभो! अपनी लीला का संवरण कर सब मनोविनोद को बढ़ाइये।’

कुछ क्षण के लिये महर्षि ध्यानावस्थित हो गये। त्रिकालज्ञ महर्षि के मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। उन्होंने चारों ओर देखा, ‘हनुमान कहाँ हैं? उनका प्रश्न गूँजा। इस प्रश्न ने सभी को झकझोर दिया। सभी की दृष्टि जन-समुदाय में हनुमान को खोजने लगी। लक्ष्मण कक्ष से बाहर निकलकर हनुमान को खोजने लगे। सहसा उनकी दृष्टि परकोटे पर आसीन हनुमान की ओर गयी। वे चुटकी बजाते हुए ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जप कर रहे थे। उनके नेत्रों से अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। प्रभु के अनन्य भक्त हनुमानकी विचत्र स्थिति देखकर लक्ष्मण भाव-विभोर हो गये। परिस्थिति का भान होने पर उन्होंने पुकारा-‘आन्जनेय! प्रभु रूग्ण हैं।’ उनका जप चल ही रहा था। ‘प्रभु अस्वस्थ हैं, बजरंगबली!’ वैसे ही जप में संलग्न रहे वे। लक्ष्मण ने तीव्र स्वर में कहा-‘प्रभु स्मरण कर रहे हैं, हनुमान!

हनुमान चैंके-‘प्रभु स्मरण कर रहे हैं? कहाँ हैं मेरे प्रभु? वे दास पर कैसी कृपा करते हतैं!’ उनका हृदय प्रसन्नता से पुलकित हो उठा। वे कूदकर लक्ष्मण के पास आये-‘प्रभु बुला रहे हैं?’ शयन-कक्ष के द्वार खुल गये। ‘प्रभु के कक्ष में यह भीड़ कैसी है?’
‘प्रभु रूग्ण हैं।’ उदासी के स्वर में लक्ष्मण ने कहा। हनुमान क्षुब्ध हो गये।

राघव की उबासी एकाएक बंद हो चुकी थी। प्रभु के मुख पर सौम्य मुसकान थिरक रही थी। सभी ने प्रसन्नता की साँस ली। हनुमानको कक्ष में प्रवेश करते देखकर प्रभु ने मुस्कराते हुए कहा-‘आओ, हनुमान!’

हनुमान प्रभु के चरणों में लोट गये।

‘प्रभो! आप अस्वस्थ हैं?’

मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ, मारूति! चिन्ता न करो।’

‘तुमने क्या चमत्कार कर दिया, बजरंगी! तुम्हारे आते ही प्रभु स्वस्थ हो गये।’- कैकेयी अम्बा बोल उठीं।

लक्ष्मण ने कहा-‘परिजनों और पुरजनों के बीच में तुम्हें न देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा था।’

गुरूदेवने कहा-‘अवश्य ही तुम्हारी अनुपस्थिति में कोई रहस्यभरी विवशता होगी।’

‘क्या कहूँ गुरूदेव।’ हनुमानने पीड़ित स्वर में कहा-‘‘आज प्रातःकाल से ही प्रभु के परिकरों ने प्रभु की समस्त सेवा का दायित्व परस्पर बाँट लिया था। मेरे लिये कोई सेवा शेष नहीं रही। प्रभु की सेवा से इस प्रकार वंचित होते देखकर मेरी आत्मा रो उठी। मुझे अपना जीवन भार लगा। मैं कातर स्वर से प्रभु से प्रार्थना करने लगा-‘मेरे नाथ! जहाज के काग की तरह मेरी दौड़ तो आप तक ही है। आपके अतिरिक्त मैं किसी को नहीं जानता। मेरे सर्वस्व तो आप ही हैं।’ सहसा मेरे हृदय में प्रेरणा हुई कि प्रभु को उबासी आने पर चुटकी बजाने का कार्य तो किसी ने नहीं लिया। अब मेरी यही सेवा रहेगी। हृदय का विक्षेप मिट गया। मैं प्रभु के मुख को निहारने लगा। जब प्रभु को उबासी आती, जब मैं चुटकी बजा देता। रात्रि हुई, प्रभु शयनागार में चले गये। द्वार बंद हो गये। अपने कर्तव्य में व्यवधान देखकर में दुःखी हुआ। प्रभु को उबासी अवश्य आयेगी। क्यों न में निरन्तर चुटकी बजाता रहूँ, जिससे क्रम में व्याघात न पड़े। मैं कँगूरे पर बैठकर प्रभु की ओर मुख करके निरन्तर चुटकी बजाने लगा।’’
लेग खिलखिलाकर हँस पड़े। प्रभु भी सेवक के भोलेपन पर मुस्कराये।

प्रभो। आपको मेरे कारण कष्ट हुआ!’ रो पड़े बजरंगी-‘क्षमा कर दो मेरी अनजारी चूकको, मेरे नाथ!’ हनुमान प्रभु के पाद-पद्यों से लिपट गये। प्रभु ने उठाकर हृदय से लगा लिया उन्हें और सबको सम्बोधित करते हुए बोले-‘हनुमानको मेरी सेवा करने में कोई व्यवधान न होगा।’

हनुमानजी प्रसन्नता से झूम-झूमकर गाने लगे-‘श्रीराम जय राम जय जय राम’। हनुमान को नृत्य करते देख सब लोग हँस पड़े।
महारानी सत्यभामा खिलखिला उठीं-‘बड़ी सुन्दर कथा है, चित्रा!’

वन्दना को देखकर सत्यभामा ने कहा-‘क्या है,वन्दना।’

‘कुमार जाग गये हैं, महारानी!’

‘आती हूँ, शेष चित्र फिर देखूँगी, चित्रा!’ कहकर महारानी चली गयीं।

समस्त पाठकगणों को-जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक-अनिल यादव

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