lord hanuman
श्री हनुमानजी जी अपनी सेना वानर-दल, भालुओं के साथ माँ सीता की खोज करते हुए विन्ध्याचल पर्वत के पास वन में पहुँचे। उस निबिड़ वन में कण्टकाकीर्ण सूखे वृक्षों के अतिरिक्त जल का कहीं नाम भी नहीं था। वानर-भालुओं का समु दाय इधर-उधर भटकते रहने से प्यास से छटपटाने लगा। उन्हें जल कहीं दीख नहीं रहा था और तृषाधिक्य से उनके कण्ठ एवं तालु सूख रहे थे, किंतु ज्ञानिनामग्रगण्य संकटमोचन आन्जनेय उनके साथ थे। उन्होंने धैर्यपूर्वक चारों ओर देखा। कुछ ही दूरी पर उन्हें तृण, गुल्म और लतादि से ढकी एक विशाल गुफा दिखाई पड़ी। उन्होंने उसमें से हंस, क्रौंच, सारस और चकवे आदि पक्षियों को निकलते हुए देखा। उन पक्षियों के पंख भीगे हुए थे, इससे जल का अनुमान कर उन्होंने सबको वहाँ चलने के लिये कहा। दुर्गम वनों के ज्ञाता पवनपुत्र श्रीहनुमान के साथ वानर-भालुओं के समुदाय ने एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए धीरे-धीरे उस गुफा में प्रवेश किया।
गुफा में कुछ दूर तक गहन अन्धकार था, किंतु आगे जाते ही उन्हें निर्मल जल से भरे सरोवर एवं साल, ताल, तमाल, नागकेसर, अशोक, चम्पा नागवृक्ष, कनेर आदि पुष्पों तथा सुमधुर फलों से लदे हुए वृक्ष भी दिखाई पड़े। इतना ही नहीं वहाँ उन्होंने अद्भुद वस्त्रालंकारों सहित एक अत्यन्त सुन्दर भवन भी देखा, जहाँ दिव्य भक्ष्य-भोज्य आदि सभी सामग्रियाँ प्रचुर मात्रा में उपस्थित थीं। किंतु वहाँ स्वर्ण-सिंहासन पर एक अत्यन्त लावण्यमयी रमणी को अपने शरीर पर वल्कल्य और कृष्ण मृचर्म धारण किये ध्यानमग्न बैठे देख वे एक-दूसरे के मुँह की ओर ताकने लगे। उस घ्यानमग्न योगिनी के शरीर से तेज प्रसरित हो रहा था। भयाक्रान्त बंदरों ने उनके चरणों में अत्यन्त श्रद्वा से प्रणाम किया।
‘तुमलोग कहाँ से आये हो?’ उन महाभागा ने बंदरों को प्रणाम करते देखकर अत्यन्त शान्त चित्त से मधुर वाणी में पूछा-‘तुम कौन हो और किस उद्देश्य से इन दुर्गम स्थानों में विचरण कर रहे हो? मेरे इस स्थान को नष्ट क्यों कर रहे हो?’
परमादरणीया देवि! ‘विशालकाय श्रीहनुमान ने अत्यन्त विनम्रता से उत्तर दिया-‘अवधनरेश दशरथ के पुत्र श्रीराम अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये अपनी धर्मपत्नी जनकनन्दिनी श्रीजानकीजी और भाई लक्ष्मण के साथ वन में पधारे थे। वहाँ उनकी परम साध्वी पत्नी को लंकाधिपति रावण हर ले गया। सुग्रीव ने श्रीराम से मैत्री होने को कारण हमें श्रीजानीकी जी की खोज करने की आज्ञा दी है। इसी शुभ कार्य से हम इधर आ गये। क्षुधा-पिपासा से आकुल होकर हम इस पवित्र गुफा में प्रविष्ट हुए हैं।’ श्रीहनुमान ने पुनः कहा-‘देवि! आप कौन हैं? कृपापूर्वक हमें भी अपना परिचय दीजिये।’
‘मेरा अहोभाग्य!’ तपः पूता योगिनी ने श्री हनुमान से कहा-‘आज मेरी तपश्चर्या सफल हो गयी। मेरे आनन्द की सीमा नहीं। सर्वथा निश्चिन्त होकर तुम लोग सर्वप्रथम यथेच्छ मधुर फलों का आहार और अमृतमय जल का पान कर लो एवं तृप्त होकर मेरे पास बैठकर विश्राम करो; तब मैं तुम लोगों को अपना वृत्तान्त सुनाऊँगी।’
श्री हनुमानजी बंदरों सहित मधुर फल खाकर एवं शीतल जल पीकर तृप्त और प्रसन्न हो गये। फिर वे योगिनी के समीप जाकर विनयपूर्वक बैठ गये।
‘पूर्वकालकी बात है।’ भक्तिमती देवी ने वानरों सहित हनुमानजी को बताया-‘‘विश्वकर्मा की हेमा नामक एक अत्यन्त सुन्दरी पुत्री थी। उसके अद्भुत नृत्य से संतुष्ट होकर आशुतोष शिव ने उसे यह विशाल दिव्य नगर रहने के लिये दे दिया। यहाँ वह सहस्त्रों वर्ष तक रही। वह मेरी प्राणप्रिय सखी थी। ब्रह्मलोक को प्रणाम करते समय उसने मुझे वास्तविक मुमुक्षु एवं क्षीराब्धिशायी श्री विष्णु की अनन्य उपासिका समझ कर प्रेमपूर्वक मुझसे कहा-‘सखी स्वयम्प्रभा! तू इस एकान्त शान्त स्थान में रहकर तप कर। त्रेतायुग में स्वयं श्री नारायण भू-भार-हरण करने के लिये अवधनरेश दशरथ की परम भाग्यवती धर्मपत्नी कौसल्या के गर्भ से प्रकट होंगे। वे धर्म-संस्थापन एवं दुष्टों के विनाश के लिये वन में भ्रमण करेंगे। उनकी परम सती पत्नी को ढूँढ़ते हुए कुछ बंदर इस गुफा में तुम्हारे पास आयेंगे। तुम भक्ष्य, भोज्य एवं मधुर जल से उनका स्वागत कर उन परमप्रभु श्रीराम के पास चली जाना। उनके दर्शन कर उनसे प्रीतिपूर्वक प्रार्थना करना; उनकी दया से तुम योगिदुर्लभ श्रीविष्णु के आनन्दमय नित्यधाम में चली जाओगी’।’’
अत्यन्त कृतज्ञतापूर्वक श्रीहनुमानजी की ओर देखती हुई तपस्विनी ने पुनः कहा-‘मैं दिव्य नामक गन्धर्व की पुत्री स्वयम्प्रभा हूँ। आज यहाँ तुम लोगों के पवित्र चरण पड़ने से मेरा भाग्य-सूर्य उदित हुआ है। अब मैं अपने प्राणाराम परमप्रिय प्रभु भगवान् श्रीराम के दर्शनार्थ जाने के लिये आतुर हो रही हूँ। तुम लोग अपने-अपने नेत्र बंद कर लो; तुरंत इस गुफा से बाहर पहुँच जाओगे। तुम सीताजी को पा जाओगे। निराश मत होओ।’
महाभागा स्वयम्प्रभा के आदेशानुसार वानर-भालुओं का यह विशाल समुदाय नेत्र बंद करते ही गुफा के बाहर अरण्य में पहुँच गया।
सारांस शुभ कार्य करते समय प्रभु की कृपा बरसती है। इसलिये फल की चिन्ता किये बिना कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिये। सब प्रभु इच्छा से होता है। श्रीहनुमानजी रामकाज सहज ही कर लिये।
जय सियाराम जय हनुमान।
लेखक-अनिल यादव।

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