hanuman ji

श्रीजनकनन्दिनी की खोज में वानर-भालू लगे हुये थे। अत्यधिक श्रम के साथ खोज करने पर भी दशानन या श्रीसीताजी का कहीं पता ही नहीं चल पा रहा था। थके हुए वानर-भालू बैठकर परस्पर विचार करने लगे कि ‘क्या किया जाय?’ उस समय अत्यन्त दुःखित होकर अंगद ने कहा-‘इस कन्दरा में घूमते हुए सम्भवतः एक मास बीत गया। राजा सुग्रीव की दी हुई अवधि समाप्त हो गयी और भगवती सीता का पता नहीं चला। अब किष्किन्धा लौटने पर तो हम निश्चय ही मारे जायँगे। मुझे तो वह छोड़ ही नहीं सकते, अवश्य मार डालेंगे; कारण मैं उनके शत्रु का पुत्र हूँ मेरी रक्षा तो धर्मात्मा वीरवर श्रीरामजी ने की है। अब प्रभु का कार्य पूरा न करने का बहाना लेकर वे मुझे किस प्रकार जीवित छोड़ सकते हैं? अतएव मैं तो लौटूँगा नहीं; किसी-न-किसी प्रकार यहीं अपना शरीर त्याग दूँगा।’

इस प्रकार साश्रुनयन युवराज को विलाप करते देखकर वानरों को बड़ा क्लेश हुआ। उन्होंने अत्यन्त सहानुभूतिपूर्वक अंगद से कहा-‘आप चिन्ता न करें हम सब अपने प्राण देकर भी आपके जीवन की रक्षा करेंगे। हम गुफा में ही सुखपूर्वक रहेंगे।’
वानरों के द्वारा धीरे-धीरे कही गयी इन बातों को सुनकर परमनीतिज्ञ पवननन्दन ने युवराज को आश्वस्त करते हुए अन्तयन्त प्रेमपूर्वक कहा-‘युवराज! तुम व्यर्थ की चिन्ता कैसे करने लगे? तुम महारानी तारा के प्राणप्रिय पुत्र होन के कारण सुग्रीव के भी सहज ही प्रिय हो और तुममें श्रीराघवेन्द्र की प्रीति तो प्रतिदिन लक्ष्मण से भी अधिक बढ़ती जा रही है। वानरों ने जो तुम्हें इस गुफा में निष्कण्टक रहने का परामर्श दिया है, वह व्यर्थ है; क्यों कि त्रैलोक्य का कोई भी लक्ष्य श्रीरघुनन्दन के बाणों से अभेद्य नहीं है। स्त्री-बच्चों से कभी पृथक न रहने वाले ये वानर तुम्हें उचित परामर्श नहीं दे रहे हैं।’

पवन पुत्र ने अत्यन्त प्रेमपूर्वक अंगद को समझाते हुए आगे कहा-‘इसके अतिरिक्त बेटा! मैं एक अत्यन्त गुप्त रहस्य और बताता हूँ; सावधान होकर सुनों। भगवान श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे साक्षात् निर्विकार श्रीनारायणदेव हैं। भगवती सीताजी जगन्मोहिनी माया हैं और लक्ष्मणजी त्रिभुवनाधार साक्षात् नागराज शेषजी हैं। वे सब ब्रह्माजी की प्रार्थना से राक्षसों के विनाश करने के लिये माया-मानवरूप में उत्पन्न हुए हैं। इनमें से प्रत्येक त्रिलोक की रक्षा करने में समर्थ है। हमारा परम सौभाग्य है कि हम परमप्रभु की लीला के कार्य में निमित्त बन रहे हैं।’

इस प्रकार युवराज अंगद को धैर्य प्रदान करने के अनन्तर परमपराक्रमी रामदूत श्रीहनुमान जाम्बवान् और अंगद आदि वानरों के साथ माता सीता को ढूँढ़ते हुए धीरे-धीरे दक्षिण-समुद्र के तटपर महेन्द्रपर्वत की पवित्र उपत्यका में जा पहुँचे। वहाँ सामने अगाध एवं असीम महासागर की भयानक लहरों को देखकर वानर-भालू घबरा गये। सीतान्वेषण के लिये सुग्रीव की दी हुई एक मास की अवधि भी समाप्त हो गयी और सामने महासमुद्र! वीर वानर-भालुओं की बुद्धि काम नहीं कर रही थी। इस कारण वानरराज सुग्रीव के कठोर दण्ड की कल्पना कर उन्होंने कहा-

‘राजा सुग्रीव बड़े दुर्दण्ड हैं; वे हमें निस्संदेह मार डालेंगे। सुग्रीव के हाथ से मरने की अपेक्षा तो प्रयोपवेशन (अन्न-जल छोड़कर कर मर जाने)-में ही हमारा अधिक कल्याण है’ ऐसा निर्णय कर वे सब जहाँ-तहाँ कुश बिछाकर मरने के निश्चय से वहीं बैठ गये।
वानरों की कोलाहल सुनकर गृध्र सम्पाति विन्ध्यगिरि की कन्दरा से बाहर निकले और जब उन्होेंने अन्न-जल त्यागकर मरने का निश्चय किये वानर-भालुओं को कुशासन पर बैठा देखा तो उनकी प्रसन्नता की सीमा न रही। सम्पाति ने हर्षातिरेकमं कहा-

विधिः किल नरं लोके विधानेनानुवर्तते।
यथायं विहितो भक्ष्यश्चिरान्मह्ममुपागतः।।
परम्पराणां भक्षिष्ये वानराणां मृतं मृतम्।।

(वाल्मीकि रामायण)

‘जैसे लोक में पूर्वजन्म के कर्मानुसार मनुष्य को उसके किये का फल स्वतः प्राप्त होता है, उसी प्रकार आज दीर्घकाल के पश्चात् यह भोजन स्वतः मेरे लिये प्राप्त हो गया। अवश्य ही यह मेरे किसी कर्म का फल है। इन वानरों में से जो-जो मरता जायगा, उसको में क्रमशः भक्षण करता जाऊँगा।’

भोजन के लिये लालायित महाकाय सम्पाति को देखकर वानरगण अत्यन्त भयभीत हो गये। वे सोचने लगे-‘हमसे न तो श्रीराम की कोई सेवा हो सकी और न सुग्रीव की ही आज्ञा का पालन हुआ; अब हम लोग व्यर्थ ही इसके पेट में चले जायँगे।’ फिर उन्होंने उस पंखहीन अत्यन्त विशाल गृध्र को सुनाकर कहा-

अहे जटायुर्धर्मात्मा रामस्यार्थे मृतः सुधीः।
मोक्षं प्राप दुरावापं योगिनामप्यरिंदमः।।

(अध्यात्म रामायण)

‘अहो! धर्मात्मा जटायु धन्य है, जिस बुद्धिमान् ने श्रीराम के कार्य में अपने प्राण दे दिये। देखो, उस शत्रुदमन ने वह मोक्षपद प्राप्त कर लिया, जो योगियों को भी दुर्लभ है।’

जटायु का नाम सुनकर सम्पाति अत्यधिक दुःखी हो गये। अत्यन्त आश्चर्य से उन्होंने वानरों से कहा-

के वा यूयं मम भ्रातुः कर्णपीयूषसंनिभम्।।
जटायुरिति नामाद्य व्याहरन्तः परस्परम्।
उच्यतां तो भयं मा मून्मत्तः प्लवगसत्तमाः।।

( अध्यात्म रामायण)

‘‘हे कपिश्रेष्ठगण! तुमलोग कौन हो, जो आपस में मेरे कानों को अमृत के समान प्रिय लगने वाले मेरे भाई ‘जटायु’ का नाम ले रहे हो। तुम मुझसे किसी प्रकार का भय न करके अपना वृतान्त कहो।’’

सम्पाति के आश्वासन देने पर भी वानर-यूथपतियों ने उप पर विश्वास नहीं किया। वे मांसभोजी महाकाय गृध्र से अत्यन्त शंकित थे। बहुत सोच-विचार के उपरान्त वानर उनके समीप गये और युवराज अंगद ने उन्हें श्रीराम के सम्बन्ध में जन्म से लेकर श्रीसीताहरण तक की सारी घटना अत्यन्त विस्तारपूर्वक सुनायी। इसके बाद जटायु के श्रीसीता की रक्षा के लिये रावण के साथ युद्ध कर श्रीराम की गोद में सुखपूर्वक प्राण-विसर्जन करने की बात कही। परम कारूणिक श्रीराम ने जिस प्रकार उनकी अन्तिम क्रिया की थी, वह भी उन्होंने भाव-विभोर होकर बतायी और अन्त में उन्होंने यह भी कहा कि ‘हमलोग वानरों के राजा सुग्रीव के आदेश से श्रीसीताजी की खोज के लिये यहाँ तक आये हैं; पर अबतक उनका कोई पता नहीं लगा, इस कारण हमलोग दुःख से अधीर और व्याकुल हो रहे हैं।’

अपने प्राणप्रिय भाई जटायु का प्रभु के लिये प्राणार्पण एवं उनकी अन्ति गति का सुखद संवाद सुनकर सम्पाति आनन्द-विहंवल हो गये। इतना ही नहीं, महामुनि चन्द्रमा के वचन के अनुसार अपने परम कल्याण का क्षण उपस्थित जानकर वे अपना सारा दुःख भूल गये। उनके अंग-अंग परमानन्द से पुलकित हो गये-

अंगदस्य वचः श्रुत्वा सम्पातिर्हष्टमानसः।।
अवाच मत्प्रियो भ्राता जटायुः प्लवगेश्वराः।
बहुवर्षसहस्त्रान्ते भ्रातृवार्ता श्रुता मया।।

( अध्यात्म रामायण)

‘‘अंगद के वचन सुनकर चित्त में प्रसन्न हो सम्पाति ने कहा-‘हे कपीश्वरों! जटायु मेरा परमप्रिय भाई है। आज कई सहस्त्र वार्षों के अनन्तर मैंने भाई का समाचार सुना है’’। फिर उन्होेंने कहा-

वाड्मतिभ्यां हि सर्वेषां करिष्यामि प्रियं हि वः।।
यद्धि दाशरथेः कार्यं मम तन्नात्र संशयः।

(वाल्मीकि रामायण)

‘मैं वाणी और बुद्धि के द्वारा तुम सबलोगों का प्रिय कार्य अवश्य करूँगा; क्योंकि दशरथनन्दन श्रीराम का जो कार्य है, वह मेरा ही है- इसमें संशय नहीं है।’

सम्पाति ने फिर कहा-‘सर्वप्रथम तुम लोग मुझे जलके पास ले चलो, जिससे मै अपने भाई को जलांजलि दे लूँ। फिर तुम लोगों की कार्य-सिद्धि के लिये मैं उचित मार्ग बताऊँगा।’

सम्पाति की इच्छा जानकर महावीर हनुमानजी उन्हें उठाकर समुद्र-तटपर ले गये। वहाँ सम्पाति ने स्नान करके जटायु को जलांजलि दी। फिर वानरगण उन्हें उनके स्थान पर ले गये। वहाँ भगवान् श्रीराम के भक्तों को सम्मुख बैठे देखकर सम्पाति के सुख की सीमा न थी। उनका शारीरिक एवं मानसिक कष्ट तो पहले ही दूर हो गया था; उन्होंने चारों ओर अपनी दृष्टि डालकर प्रभु के प्रिय भक्तों को अत्यन्त आदरपूर्वक बताया-

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका।
तहँ रह रावन सहज असंका।।
तहँ असोक उपबन जहँ रहई।
सीता बैठि सोच रत अहई।।
मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार।
बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।

(श्रीरामचरित मानस)

‘त्रिकूट पर्वत पर लंकानगरी है। वहाँ रावण सहज ही निःशंक रहता है। वहाँ अशोक नामक एक उपवन है, जहाँ श्रीसीताजी शोकमग्न बैठी हैं। मैं सब देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्यों कि गृध्रकी दृष्टि अपार-बहुत दूर तक जाने वाली होती है। मैं वृद्ध हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ सहायता करता।’

फिर उन्हंे प्रोत्साहित करते हुए सम्पाति ने उससे कहा-
तद् भवन्तो मतिश्रेष्ठा बलवन्तो मनस्विनः।।
प्रहिताः कपिराजेन देवैरपि दुरासदाः।

(वाल्मीकि रामायण)

‘तुम लोग भी उत्तम बुद्धि से युक्त, बलवान्, मनस्वी तथा देवताओं के लिये भी दुर्जेय हो। इसीलिये वानरराज सुग्रीव ने तुम्हें इस कार्य के लिये भेजा है।’

तदनन्तर उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण के तीक्ष्ण शरों की महिमा का गान करते हुए वानर-भालुओं से कहा-

राम लक्ष्मणबाणाश्च विहिताः कंकडपत्रिणः।।
त्रयाणामपि लोकानां प्र्याप्तास्त्राणनिग्रहे।
कामं खलु दशग्रीवस्तेजोबलसमन्वितः।
भवतां तु समर्थानां न किंचिदपि दुष्करम्।।

(वाल्मीकि रामायण)

‘श्रीराम और लक्ष्मण के कंकडपत्र से युक्त जो बाण हैं, वे साक्षत् विधाता के बनाये हुए हैंै। वे तीनों लोकों का संरक्षण और दमन करने के लिये पर्याप्त शक्ति रखते हैं। तुम्हारा विपक्षी दशग्रीव रावण भले ही तेजस्वी और बलवान् है, किन्तु तुम-जैसे सामथ्र्यशाली वीरों के लिये उसे परास्त करना आदि कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है।’

प्रोत्साहन देने के अनन्तर सम्पाति ने कहा-‘तुम लोग किसी-न-किसी तरह समुद्र लाँघने का प्रयत्न करो। राक्षसराज रावण को तो वीरवर श्रीरामचन्द्रजी स्वयं मार डालेंगे। तुम लोग विचार कर लो कि तुममें ऐसा कौन वीर है, जो समुद्र लाँघकर लंका में पहुँच जाय और माता सीता के दर्शन एवं उनसे बातचीत किर पुनः समुद्र के इस पार आ जाय।’

सम्पाति के द्वारा माता सीता का पता पाकर वानर-वृन्द्र हर्ष की सीमा न रही। उन्होंने कौतूहलवश सम्पाति का पूरा जीवन-वृतान्त जानने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने उन्हें बड़े ही आदर और प्रेमपूर्वक अपने पंख भस्म होने एवं चन्द्रमा मुनि के द्वारा कही गयी सारी वातें सुना दीं। इसके अनन्तर उन्होंने कहा-‘‘वानरो! पंखहीन पक्षी की विवशता क्या कही जाय? मेरी इस अत्यन्त दयनीय स्थिति में मेरा पुत्र पक्षिप्रवर सुपाश्र्व ही मुझे यथासमय आहार प्रदान कर मेरा भरण-पोषण करता आया है। हमलोगों की क्षुधा अत्यन्त तीव्र होती है। एक दिन मैं भूख से छटपटा रहा था, किंतु मेरा पुत्र देर से रिक्तहस्त लौटा; इस कारण मैंने उसे अनेक कटु बातें कहीं। इस पर उसने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक मुझसे कहा-‘मैं आपके आहार के लिये यथासमय आकाश में उड़ा और महेन्द्रगिरि के द्वार को रोक कर अपनी चोंच नीची किये समुद्री जीवों को देखने लगा। उसी समय वहाँ मैंने एक कज्जलिगिरि की भाँति बलवान् पुरूष को देखा, जो अपने साथ एक आलौकिक तेजस्विनी स्त्री को बलात् लिये जा रहा था। उस स्त्री और पुरूष के द्वारा मैंने आपकी भूख मिटाने का निश्चय किया, किन्तु उस पुरूष की अत्यन्त मधुर एवं विनम्र वाणी से प्रभावित होकर मैंने उसे छोड़ दिया।’

‘इसके अनन्तर मुझे महर्षियों एवं सिद्ध पुरूषों से विदित हुआ कि वह आलौकिक तेजस्विनी स्त्री दशरथनन्दन श्रीराम की पत्नी भगवती सीता थीं और काला पुरूष लंगाधिपति रावण था। श्रीसीताके केश खुले हुए थे। वे अत्यन्त दुःख से श्रीराम और लक्ष्मण का नाम लेकर विलाप कर रही थीं और उनके आभूषण गिरते जा रहे थे। इसी कारण मुझे यहाँ आने में देर हो गयी।’
‘‘पंखहीन, असहाय और विवश मैं छटपटाकर रह गया। मैं कुछ नहीं कर सकता था। दुष्ट रावण की शक्ति से मैं परिचित था, इस कारण जगदम्बा सीता की रक्षा करने के कारण मैंने उसे कठोर बचन कहे।’’ फिर सम्पाति ने कहा-

तस्या विलपितं श्रुत्वा तो च सीतावियोजितौ।।
न मे दशरथस्नेहात् पुत्रेणोत्पादितं प्रियम्।

(वाल्मीकि रामायण)

‘श्रीसीता का विलाप सुनकर और उनसे बिछुुडे़ हुए श्रीराम तथा लक्ष्मण का परिचय पाकर तथा राजा दशरथ के प्रति मेरे स्नेह का स्मरण करके भी मेरे पुत्र ने जो सीताजी की रक्षा नहीं की, अपने इस बर्ताव से उसने मुझे प्रसन्न नहीं किया- मेरे प्रिय कार्य नहीं होने दिया।’

परम भाग्यवान् सम्पाति वानरों को अपनी कथा सुना ही रहे थे कि उनके दो नये पंख निकल आये। उनमें यौवन-काल का बल भी उत्पन्न हो गया। महर्षि चन्द्रमा की वाणी का स्मरण करके वे अत्यन्त सुखी हुए। उन्होंने वानरों से कहा-

सर्वथा क्रियतां यत्नः सीतामधिगमिष्यथ।।
पक्षलाभो ममायं वः सिद्धिप्रत्ययकारकः।

(वाल्मीकि रामायण)

‘वानरों! तुम सब प्रकार से यत्न करो। निश्चय ही तुम्हें माता सीता का दर्शन प्राप्त होगा। मुझे पंखों का प्राप्त होना तुम लोगांे की कार्य-सिद्धि का विश्वास दिलाने वाला है।’
फिर उन्होंने भगवान् श्रीराम के मंगलमय नाम की महिमा का बखान करते हुए उनके लिये समुद्रोल्लंघन अत्यन्त सरल कार्य बताया। सम्पाति ने कहा-

यन्नामस्मृतिमात्रतोऽपरिमितं संसारवारांनिधिं तीत्र्वा
गच्छति दुर्जनोऽपि परमं विष्णोः पदं शाश्वतम्।
तस्यैव स्थितिकारिणस्त्रिजगतां रामस्य भक्ताः प्रिया
यूयं किं न समुद्रमात्रतरणे शक्ताः कथं वानराः।।

(अध्यातम रामायण)

‘वानरगण! जिनके नाम के स्मरण मात्र से महान् दुष्टजन भी इस अपार संसार-सागरको पार करके भगवान् विष्णु के सनातन परमपद को प्राप्त कर लेते हैं, तुम लोग त्रिलोकी की स्थिति करने वाले उन्हीं भगवान् श्रीराम के प्रिय भक्तगण हो। फिर इस क्षुद्र समुद्रमात्र को पार करने में तुम क्यों समर्थ न होंगे?’

विनीतात्मा परमपराक्रमी पवनकुमार भग्यवान् सम्पाति के एक-एक शब्द ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। माता सीता का सुस्पष्ट पता विदित हो जाने पर श्री रामदूत हनुमानजी की प्रसन्नता की सीमा न रही। उनके रोम-रोम पुलकित हो गये।
उसी समय पक्षिश्रेष्ठ सम्पाति उस पर्वत-शिखर से उड़कर चले गये।

सारांस यही है कि श्रीसीताराम जी के चरणों में अनुराग हो तो कोइ भी कार्य असम्भव नहीं है। हनुमानजी महाराज ने सहज ही समस्त कार्य किये।

पाठकबन्धुओं को जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक- अनिल यादव।

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