mata sita aur hanuman ji

मृगचर्म और जटा-मुकुट से सुशोभित सजल-जलद-वपु भगवान् श्रीराम गुफा के द्वार पर एक शिला खण्ड पर बैठे उदास मन से पक्षियों को देख रहे थे। दूर से शन्तमूर्ति श्रीरघुनाथजी का दर्शन होते ही सुग्रीव और लक्ष्मण रथ से उतर पड़े। सुग्रीव तीव्र गति से प्रभु के समीप पहुँचे और अबोध बालक की तरह प्रभु-पद-पद्यों में गिरकर सिसकने लगे। दयामूर्ति श्रीराम ने उन्हें तुरंत उठाकर अपने हृदय से लगा लिया और फिर अपने समीप बैठाकर वे प्रेमपूर्वक उनका कुशल पूछने लगे।

सुग्रीव ने हाथ जोड़कर अत्यन्त विनयपूर्वक कहा- ‘प्रभो! मेरा कोई दोष नहीं। आपकी माया ही अत्यन्त प्रबल है। इससे तो आपकी कृपा से ही पार पाया जा सकता है। मैं तो अतिशय भोगासक्त पामर पशु हँू। आप मुझ पर दया कीजिये स्वामी!’
करूणामय श्रीराम वानरराज सुग्रीव के मस्तक पर अपना कर-कमल फेरने लगे। उसी समय कोटि-कोटि वीर वानर-भालुओं का समूह आता हुआ दिखायी दिया।

उन्हें देखकर सुग्रीव ने श्रीरघुनाथजी से कहा-‘प्रभो! ये समस्त वानर-भालू आपकी आज्ञा के पालक एवं फल-मूल आदि खाने वाले हैं। ये रीछों के अधिपति जाम्बवान् अत्यन्त बलवान्, अद्भुद योद्धा एवं परम बुद्धिमान् हैं। ये एक करोड़ भालुओं के यूथपति और मेरे मंत्रियों में अग्रगण्य हैं। इनके अतिरिक्त नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ, मैन्द, गज, पनस, बलीमुख, दधिमुख, सुषेण, तार तथा हनुमान के पिता महाबली और परम धीर केशरी-ये मेरे प्रधान यूथपति हैं। इनके अधीन पर्वत-तुल्य विशालकाय कोटि-कोटि वानर-वीर हैं। ये सब-के-सब युद्धभूमि में आपके लिये सहर्ष प्राण दे देंगे। आप इन्हें इच्छानुसार आज्ञा प्रदान कीजिये।’

सर्वशक्तिसम्पन्न श्री रघुनाथजी ने सुग्रीव से कहा ‘सुग्रीव! तुम मेरा कार्य जानते ही हो। यदि उचित समझो तो इन्हें यथाशीघ्र जानकी को खोजने के लिये नियुक्त कर दो।’

सुग्रीव ने समस्त यूथपतियों को सावधानीपूर्वक सर्वत्र श्रीसीताजी का पता लगाने के लिये आज्ञा देते हुए कहा-

विचिन्वन्तु प्रयत्नेन भवन्तो जानकीं शुभाम्।
सामादर्वाड्निवर्तध्वं मच्छासनपुरः सराः।।
सीतामदृष्टवा यदि वे मासादूध्र्वं दिनं भवेत्।
तदा प्राणान्तिकं दण्डं मत्तः प्राप्स्यथ वानराः।।
(अ0रा0)

‘मेरी आज्ञा से तुम सब लोग बड़े प्रयत्न से जानकी जी की खोज करो और एकमास के भीतर ही लौट आओ। यदि श्रीसीताजी को बिना देखे तुम्हें एक मास से एक दिन भी अधिक हो जायगा तो हे वानरो! याद रखो, तुम्हें मेरे हाथ से प्राणान्त दण्ड भोगना पड़ेगा।’

इस प्रकार सुग्रीव ने वानर और भालुओं के यूथपतियों को सीता का शीघ्र पता लगाने के लिये कठोरतम् आदेश प्रदान किया। उन्होंने समस्त दिशाओं में अनेकों वानरों को भेजकर दक्षिण दिशा में अधिक प्रयत्न के साथ महाबली युवराज अंगद, जाम्बवान्, हनुमान, नल, सुषेण, शरभ मैन्द और द्विविद आदि को भेजा। उस समय उन्होंने वीरवर हनुमान की प्रशंसा करते हुए उनसे कहा-

‘कपिश्रेण्ठ! पृथ्वी, अन्तरिक्ष, आकाश, देवता, समुद्र तथा पर्वतों सहित सम्पूर्ण लोकों का तुम्हें ज्ञान है। वीर! महाकपे! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और स्फूर्ति-ये सभी सद्गुण तुममें अपने महापराक्रमी पिता वायु के ही समान हंै। इस भूण्डलमें कोई भी प्राणी तुम्हारे तेजकी समानता करने वाला नहीं है; अतः जिस प्रकार श्रीसीताजी की उपलब्धि हो सके, वह उपाय तुम्हीं सोचो। हनुमान्! तुम नीतिशास्त्र के पण्डित हो। एकमात्र तुम्हीं में बल, बुद्धि, पराक्रम, देश-काल का अनुसरण तथा नीतिपूर्ण बर्ताव एक साथ देखे जाते हैं।’

इस प्रकार श्रीपवनकुमार गुण-गान करते हुए समस्त वानरों को श्रीतान्वेषणार्थ आदेश देकर सुग्रीव श्रीरघुनाथजी के समीप बैठ गये। वीर वानर और भालू कमल-नयन श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके जाने लगे। सबके अन्त में जब श्रीपवनपुत्र प्रभु के समीप पहुँचे, तब भगवान् श्रीराम ने उनसे कहा-‘वीरवर! तुम्हारा उद्योग, धैर्य एवं पराक्रम और सुग्रीव का संदेश-इन सब बातों से लगता है कि निश्चय ही तुमसे मेरे कार्य की सिद्धि होगी। तुम मेरी यह अँगूठी ले जाओ; इस पर मेरे नामाक्षर खुदे हुए हैं। इसे अपने परिचय के लिये तुम एकान्त में सीता को देना। कपिश्रेष्ठ! इस कार्य में तुम्हीं समर्थ हो। मैं तुम्हारा बुद्धिबल अच्छी तरह जानता हूँ। अच्छा, जाओ! तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो!

पवनकुमार ने प्रभु की मुद्रिका अत्यन्त आदरपूर्वक अपने पास रख ली और उनके चरण-कमलों में अपना मस्तक रख दिया। भक्तवत्सल प्रभु का कर-कमल स्वतः उनके मस्तक पर चला गया। बड़ी कठिनाई से हनुमानजी उठे। प्रभु-चरणों की पावनतम् धूलि उन्होेेंने माथे चढ़ायी और प्रभु की निखिलपावन दिव्य मूर्ति को हृदय में धारणकर वे उत्साहपूर्वक चल पड़े। उनकी जिव्हा से श्रीराम-नाम का अखण्ड जप होता रहा था।

सारांस यह है कि कोई भी कार्य करने से पहले श्रीरघुनाथ जी को हृदय में धारणकर अखण्ड श्रीराम-नाम का जप करना चाहिये। कार्य अवश्य पूर्ण होगा।

समस्त पाठाकबन्धुओं को जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक- अनिल यादव।

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