हमारे भारत के छोटे-से छोटे और बड़े-से-बड़े, किसी भी नगर में आप जायेंगे तो वहाँ आपको कहीं-न-कहीं श्रीहनुमानजी का मन्दिर अवश्य देखने को मिल जायगा। स्थान-स्थान पर साधकगण ‘श्रीहनुमानचालीसा’ का बड़ी ही श्रद्धा से पाठ करते भी मिल जायेंगे। लगभग प्रत्येक भाषा में हनुमान चालीसा की पुस्तक भी आपको मिल जायेगी। राजस्थान के सालासर-जैसे कुछ सिद्ध स्थान भी देखने को मिल जाएगे, जहाँ के दर्शनार्थियों का यह पूरा विश्वास है कि श्रीहनुमानजी के समक्ष शुद्ध मन से जो भी मनौती की जायगी, वह अवश्य पूरी होगी। साधक श्री हनुमानजी को ऐसा श्रीराम-भक्त मानते हैं, जिनके पास अतुलित बल है और जो साधकों की प्रार्थना को स्वीकार कर उन्हें संकट से बचा देते हंै। इसलिये श्री हनुमानजी की साधना प्रत्येक वयक्ति को अवश्य करनी चाहिये क्योंकि श्री हनुमानजी की साधना से ही साधक को प्रभु श्रीराम के दर्शन मिल सकते हैं। यही इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

एक बार श्रीहनुमान जी के भक्त डा0 सुरेशचन्द्र जी सेठ, के यहाँ एक संत घर पर पधारे थे। सेठजी के घर के कोने में श्री बजरंगबली की बड़ी ही आकर्षक प्रतिमा लगी हुई थी। प्रतिमा को देखकर संत भगवान उनसे पूछने लगे-‘क्या तुम्हारे आराध्य हनुमान हैं?’ उन्होंने बड़ी सरलता से उत्तर दिया-‘‘मैं तो उस अव्यक्त को ही अपना आराध्य मानता हूँ; फिर भी यदि मुझे नाम ‘राम’ का प्रिय लगता है तो रूप ‘कृष्ण’ का। श्री हनुमान जी महाराज के प्रति मेरा विश्वास बहुत है; क्योंकि ‘रामदुआरे के यही रखवारे’ है। और इनकी आज्ञा के बिना प्रभु के दरबार में प्रवेश नहीं हो सकता।’’ यह सुनकर उन्होंने इतना ही कहा-‘‘बिलकुल ठीक है, प्रभु-विश्वास ही ‘श्रीहनुमानजी’ हैं।’’

इस प्रकार संत भगवान ने सेठ जी के कथन के रहस्य की पुष्टि कर दी।

पूज्य स्वामी शरणानन्दजी महाराज कहा करते हैं कि प्रत्येक साधक के जीवन में आस्था का तत्व विद्यमान है। दूसरी ओर उसे विचार-शक्ति एवं क्रिया-शक्ति प्राप्त है। इस आस्था के तत्व को ही वे विश्वास-मार्ग में प्रधानता देते हैं। प्रभु-विश्वासी हुए बिना साधक की साधना सफल नहीं होती और प्रभु-विश्वास ही साधक को प्रभु-प्रेमी बना देता है।

उन्हेंने एक साधक से कहा-‘प्रभु-प्रेम-प्राप्ति-हेतु तुुम हनुमानजी को अपना इष्ट बना लो।’ संतो के उपदेश की शैली बड़ी ही निराली होती है। वे भिन्न-भिन्न साधकों को एक कुशल बैद्य के समान भिन्न-भिन्न पथ और पथ्य बता देते हैं, किंतु प्रभु-प्रेमी की बात अन्त में ही कहते हैं। पूज्य स्वामी जी के इस संकेत से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि पत्येक वयक्ति को श्री हनुमानजी का अनन्य भक्त होना चाहिये।

मुझे तो हमेशा से ही ऐसा लगता है कि प्रभु-विश्वास के प्रतीक सचमुच हमारे श्री हनुमानजी महाराज है। जिस व्यक्ति की हनुमानजी में आस्था हो जाती है, उसका प्रभु-विश्वास बढ़ने लगता है और विश्वास का तत्व ही साधक को विविध बाधाओं से निकालता हुआ प्रभु-प्रेम पाने का अधिकारी बना देता है। इसलिये ‘राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।’ कहा जाता है। जिसका प्रभु में विश्वास ही नहीं होगा, वह उनके साम्राज्य में कैसे प्रवेश पा सकता है? ईष्वर-विश्वासी की बुद्धि स्वतः निर्मल होने लगती है। विश्वासी साधक हनुमानजी महाराजी की कृपा से उनके ही समान ‘ज्ञान-गुन-सागर’ बन जाता है।

श्री बजरंगबली को कुमति का निवारण करने वाला, महातेजस्वी, प्रतापी और ‘राम काज करिबे को आतुर।।’ बताया गया है। मेरा विश्वास है कि जिस साधक पर हनुमानजी कृपा कर देते हैं, वह भी प्रभु का ही कार्य करने लगता है। फिर तो उसे भी हनुमानजी के समान प्रभु-चरित्र सुनना और सुनाना ही सुहाता है। हनुमानजी साधक की बुद्धि को विवेकवती बनाकर उसे संसार सागर से पार करने की सामथ्र्य प्रदान कर देते हैं। उनकी कृपा से साधक को वास्तविक सुख तथा आनन्द प्राप्त हो जाते हैं।

वास्तव में ईश्वर-विश्वासी को ‘श्री हनुमानचालीसा’ की एक-एक पंक्ति की सत्यता का अनुभव होने लगता है। उसका विश्वास उसे अष्ट सिद्धियों तथा नवों निधियों को दिलाने में समर्थ है। उसके लिये श्री रामकृष्ण परमहंस का जीवन उदाहरण है, जिन्हें मातृ-विश्वास के बलपर सभी कुछ प्राप्त था। ईश्वर-विश्वास ही वह ‘राम-रसायन’ है, जिसे साधक हनुमानजी से माँग सकता है। व्यक्ति के जन्म के दुःखों को दूर करने में, साधक को पूर्ण प्रभु-विश्वासी बनाने में और अन्तकाल में रघुपुर में श्री राम से मिलाने में श्री हनुतमानजी पूर्ण समर्थ हैं। श्री हनुमानजी विश्वास के प्रतीक हैं और प्रभु-विश्वासी साधक के प्रभु-विश्वास को पुष्ट करने के लिये

श्रीहनुमानजी की उपासना अति आवश्यक है।
सारांस कलयुग में श्री हनुमानजी की उपासना करके प्रभु-विश्वासी बनना बहुत ही सरल उपाय है।

समस्त पाठक बन्धु को मेरो -जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक- अनिल यादव।

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