lord hanuman

इस धर्म-प्राण आर्य-धरा पर शायद ही कोई जनपद, कोई नगर और कोई गाॅंव ऐसा होगा, जहाॅं पवनकुमार का छोटा-बड़ा मन्दिर या मूर्ति न हो। अखाड़ों पर, जहाँ मूर्ति नहीं है, वहाँ उनकी मिट्टी की ही मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है। सच तो यह है-महावीर हनुमान भारत के तन, मन एवं प्राण में व्याप्त हैं और वे सदा ही हमें शक्ति, भक्ति, समर्पण, श्रम, निश्छल सेवा, त्याग, बलिदान आदि की प्रेरणा देते रहते हैं। परमादर्श श्री हनुमानजी का जीवन प्रकाश-स्तम्भ की भाँति हमारे कल्याण-मार्ग का निश्चित दिशा-निर्देश करता रहता है।

श्री सीताराम के अनन्य भक्त श्री हनुमानजी अखण्ड ब्रम्हचर्यब्रत का पालन करने वाले एवं शूरता, वीरता दक्षता, बुद्धिमत्ता आदि गुणों के पुंज हैं। वज्रांग हनुमानजी अत्यन्त शक्तिसम्पन्न एवं पर पराक्रमी तो हैं ही, अत्यन्त बुद्धिमान्, शास्त्रों के पारंगत विद्वान, परम नीतिज्ञ एवं सरलता की मूर्ति हैं। उनके तन, मन, प्राण एवं रोम-रोम में अवधेश-कुमार श्रीराम इस प्रकार व्याप्त हो गये हैं कि हनुमानजी का पृथक अस्तित्व ही नहीं रह गया है। वे श्रीराममय हो गये हैं। परमप्रभु श्रीराम में उन्होंने स्वयं निवदेन किया है- ‘प्रभो! देहदृष्टि से तो मैं आपका दास हूँ, जीवरूप से आपका अंश हूँ तथा परमार्थदृष्टि से तो आप और मैं एक ही हॅू; यह मेरा निश्चित मत है।

श्री हनुमानजी को प्रसन्न होते देर नहीं लगती। ‘राम-राम’, सीताराम-सीताराम जपना प्रारम्भ कर दीजिये, बस वे श्रीरामभक्त उपस्थित हो जाते हैं। मनुष्य किसी प्रकार प्रभुकी ओर उन्मुख हो जाय, वह जन्म-जरा-मरण से मुक्ति प्राप्त कर ले, दयामय प्रभु की ओर पग बढ़ाकर, उनपर समर्पित होकर अपना सुनिश्चित कल्याण कर ले-इसके लिये कृपामूर्ति श्री हनुमानजी सर्वदा प्रयत्न करते रहते हैं; किसी-न-किसी बहाने से प्रेरणा और प्रोत्साहन भी देते रहते हैं। भक्तों को तो वे प्राणों से अधिक प्यार करते हैं।
समस्त अमंगलों का नाश करने वाले मंगलमूर्ति भक्तवर श्री हनुमान जी का चरित्र परम पवित्र, परम मधुर एवं परमादर्श तो है ही, अत्यन्त अदभुद भी है। श्री हनुमानजी की परम पुण्यमयी माता अन्जनादेवी हैं; किंतु वे ‘शंकर सुअन’, ‘वायुपुत्र’ और ‘केसरीनन्दन’ कहे जाते हैं, अर्थात शिव, वायु और केसरी उनके पिता हैं। इस रहस्य को स्पष्ट करने वाली विभिन्न कथाएँ पुराणों में प्राप्त हैं और कल्पभेदसे सभी सत्य हैं। श्रद्धापूरित हृदय से ही उनका अध्ययन, मनन, चिन्तन आदि करना चाहिये।

सौभाग्यशलिनी माता अन्जना-
स्वर्गाधिप शचीपति इन्द्र की रूप-गुण-सम्पन्ना अपसराओं में पुज्जिकस्थला नामकी एक प्रख्यात अप्सरा थी। वह अत्यन्त लावण्यवती तो थी ही, चन्चला भी थी। एक बार की बात है कि उसने एक तपस्वी ऋषि का उपहास कर दिया।

ऋषि इसे नहीं सह सके। क्रुद्ध होकर उन्होंने शाप दे दिया-‘वानरी की तरह चच्छलता करने वाली तू वानरी हो जा।’

ऋषि का शाप सुनते ही पुज्जिकस्थला काँपने लगी। वह तुरंत ऋषिके चरणों पर गिर पड़ी और हाथ जोड़कर उनसे दया की भीख माँगने लगी।

सहज कृपालु ऋषि द्रवित हो गये और बोले-‘मेरा वचन मिथ्या नहीं हो सकता। वानरी तो तुम्हें होना ही पड़ेगा, किंतु तुम इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ होओगी। तुम जब चाहोगी, तब वानरी और जब चाहोगी, तब मानुषी के वेष में रह सकोगी।’

उस परम रूपवती अप्सरा पुज्जिकस्थला ने ऋषि के शाप से कपियोनि में वानरराज महामनस्वी कुज्जरकी पुत्री के रूप में जन्म लिया। वह प्रख्यात अनिन्द्य सुन्दरी थी। उसके रूपकी समानता करनेवाली धरतीपर अन्य कोई स्त्री नहीं थी। उस त्रैलोक्य-विख्यात सुन्दरी कुज्जरपुत्री का नाम था-‘अन्जना’।

लवण्यवती अन्जना का विवाह वीरवर वानरराज केसरी से हुआ। कपिराज केसरी काज्जनगिरि (सुमेरू) पर रहते थे। समस्त सुविधाओं से सम्पन्न इसी सुन्दर पर्वत पर अन्जना अपने पतिदेव के साथ सुखपूर्वक रहने लगीं। वीरवर केसरी अपनी सुन्दरी पत्नी अन्जना को अत्यधिक प्यार करते और अन्जना सदा अपने प्राणाराध्य पतिदेव में ही अनुरक्त रहती थीं। इस प्रकार सुखपूर्वक बहुत दिन बीत गये; पर उनके कोई संतान नहीं हुई।

श्रीहनुमानजी की उत्पत्ति के विभिन्न हेतु- श्रीहनुमानजी की उप्तत्ति के सम्बन्ध में शास्त्रों में विभिन्न कथाएं उपलब्ध होती हैं। संक्षेप में वे इस प्रकार हैं-

अनन्त करूणा एवं प्रेमकी मूर्ति श्री भगवान्की लीला मधुर, मनोहर एवं अदभुत होती है। उसके स्मरण एवं श्रवण से मुनिगढ मुग्ध हो जाते हैं। भक्तों की तो वह परम निधि ही होती है; किंतु वह लीला होती है-रहस्यमयी। परम मंगलकारिणी भगवल्लीला का रहस्य देवता एवं योगीन्द्र-मुनीन्द्रगण भी नहीं जान पाते; वह आश्चर्यचकित होकर मौन हो जाते हैं, फिर हम कामादि दोषों से ग्रस्त सांसारिक मनुष्य उसे कैसे सोच-समझ सकते हैं। हाॅं, उन करूणामय लीला-विहारी की लीला का गुण-गान हमारे लिये परम कल्याणकारी है।

1-देवताओं और दैत्यों में अमृत-वितरण के लिये परमप्रभुने मोहिनी रूप धारण किया था, यह सुरकर कर्पूगौर नीलगण्ठ बहुत चकित हुए-

श्री भगवान् का स्त्री-वेष कैसा था? आप्तकाम भगवान् शंकर के मनमें अपने प्राणाराध्य के उस विशिष्ट रूप एवं विशिष्ट लीला के दर्शन करने की कामना उदित हुई।

गंगाधर माता पार्वती के साथ क्षीराब्धि के तटपर पहुँचे। उन्होंने स्तवन किया। लक्ष्मीपति प्रकट हुए। देवाधिदेव महादवे ने निवेदन किया-‘प्रभो! मैंने आपके मत्स्यादि सभी अवतार-स्वरूपों का दर्शन किया था, किंतु अमृत-वितरण के समय आपने परम लावण्यमयी स्त्री का वेष धारण किया, उस अवतार-स्वरूप के दर्शन से मैं वंचित ही रह गया। कृपया मुझे उस रूप के भी दर्शन करा दें, जिसे देखकर देवता और दानव-सभी मोहित हो गये थे।’

देवाधिदेव महादेव! आप योगियों के उपास्य एवं मदन का दहन करने वाले हैं। आप स्त्री-अवतार देखकर क्या करेंगे? आपके लिये उसका कोई महत्व नहीं।’ लक्ष्मीपति ने हॅंसते हुए उत्तर दिया।

‘पर प्रभो! मैं उक्त अवतार-स्वरूपके दर्शन से वंचित रहना नहीं चाहता।’ पार्वतीश्वर ने साग्रह निवेदन किया-‘कृपया मुझे उस मोहिनी स्वरूप के भी दर्शन करा ही दें।’

‘तथास्तु!’ क्षीराब्धिशायी संक्षिप्त उत्तर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। अब वहाँ न तो क्षीरोदधि था और न नव-नीरद-वपु, शंख-चक्र-गदा-पद्यधारी लक्ष्मीपति ही थे। वहाॅं थे सर्वत्र मनोहर पर्वत एवं सुरम्य वन माता पार्वती सहित भगवान् शंकर उस सुखद वन प्रान्त के मध्य में थे।

वन में पूर्णतया वसन्त छाया था। वृक्षों में नये कोमल पत्ते निकल आये थे। सर्वत्र पुष्प खिले थे और उन सुगन्धित सुमनों पर भ्रमर गुज्जार कर रहे थे। कोकिला ‘कुहू-कुहू’ शब्द कर रही थीं। शीतल-मन्द समीर में कोमल लतिकाएॅं एवं पुष्प धीरे-धीरे झूम रहे थे। सर्वत्र ऋतुराज का साम्राज्य प्रसरित था एवं मादकता व्याप्त थी।

सहसा योगियों के उपास्य त्रिनेत्रने कुछ दूरपर लता ओटमें देख-एक अत्यन्त रूपवती स्त्री अपने कर कमलों पर कन्दुक उछालती हुई रह-रहकर दीख जाती है।

कामारि अधीर होने लगे। जिस अनन्त अपरिसीम सौन्दर्य-सन्धिु के एक सीकरकी तुलना सृष्टि की सम्पूर्ण सौन्दर्य-राशि से सम्भव नहीं, वह सौन्दर्य-सिन्धु स्वयं जब मूर्त हो उच्छलित होता दीख जाय, तब क्या हो? उसके सम्मुख लावण्यमयी अप्सराओं का त्याग और काम-दहन की क्या गणना? भोलेनाथ को अपनी भी सुध न रही। वे निर्निमेष दृष्टि से कन्दुक द्वारा क्रीड़ा करती हुई मोहिनी को देख रहे थे।

सहसा पवन का झोंका आया और जैसे बिजली सी कौंध गयी-अप्रतिम सौन्दर्यशालिनी मोहिनी का वस्त्र खिसका और वह नग्नप्राय हो गयी। लाज से सिकुड़ी मोहिनी लताओं में छिपने का प्रयत्न करने लगी और चिता-भस्म-घारण करने वाले योगिराज कामारि का अवशिष्ट धैर्य भी समाप्त हो गया। वे महामहिमामयी माता पार्वती के सम्मुख ही लज्जा त्यागकर उन्मत्तकी तरह मोहिनी के पीछे दौड़े।

मोहिनी ने योगीश्वर शंकर को अपनी ओर आते देखा तो मुस्कुराकर लताओं की ओट में अपने अगों छिपाने का प्रयत्न करती हुई दूर भागने लगी। भूतभवन मोहिनी के पीछे दौड़ रहे थे और वह भागी जा रही थी। नीलकण्ठ को अपनी स्थिति का अनुमान भी नहीं था। उन्होंने दौड़कर मोहिनी के करका स्पर्श कर लिया।

प्रज्वलित अग्नि में घृताहुति पड़ गयी, पर मोहिनी हाथ छुड़ाकर भागी। उसके स्पर्श से उत्तेजित कामारि पूर्णतया बेसुध हो युके थे। वनों, पर्वतों, ऋषियों के आश्रमों एवं देवलोक में भी भगवान् शंकर मोहिनी के पीछे-पीछे दौड लगा रहे थे और माता पार्वती, शिवगण, सुरगण एवं ऋषिगण-सभी आश्चर्यचकित हो यह दृश्य देख रहे थे; पर थे सभी मौन। असफल काम क्रोध के रूप में परिणत हो जाता है और फिर प्रलयंकर शंकर के रोषनलकी आहुति कौन बने सभी स्तब्ध थे, जैसे सभी जड़-से हो गये हों।
अन्ततः योगिराज शिवका रेतस् स्खलित हुआ। अब उन्हें अपनी स्थिति का भान हुआ। विश्वनाथ ने तुरंत हाथ जोड़ लिये और मस्तक झुकाकर कहा-‘प्रभो! आपकी लीला अगम्य है। आपकी माया का पार पाना सम्मभव नहीं है।’

अपने परमप्रभु की लीलाकी अगभ्यता एवं अनिर्वचनीयता को समझकर भगवान् शंकर उनका ध्यान करने जा ही रहे थे कि उनके सम्मुख वनमालाधारी चतुर्भुज प्रभु प्रकट हुए और उमावल्लभ शिवकी निष्ठा एवं विश्वासकी प्रशंसा कर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। परमपिता कर्पूरगौर भी माता पार्वती के साथ प्रभु-गुण-गान करते हुए कैलास के लिये चल पड़े।

भगवान् शंकर का अमोध वीर्य व्यर्थ कैसे जाता? उस वीर्यका राम-कार्यकी सिद्धि के लिये प्रयोग करने की दृष्टि से भगवान् शंकर ने सप्तर्षियों को प्रेरित किया। उन्होंने उस वीर्य को पत्तेपर स्थपित कर लिया और समय से उसे केसरी पत्नी अन्जना में कर्ण-मार्ग से प्रवेश करा दिया उसके फलस्वरूप श्री हनुमानजी प्रकट हुए।

2-पति के साथ दीघकालतक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती हुई अन्जना को कोई संतान हीं हुई। इस कारण वे अत्यन्त कठोर तप करने लगीं।

अन्जना को तपश्चरण करते देख महामुनि मतंग ने उनके पास जाकर पूछा-‘अन्जना देवि! तुम इतना कठोर तप किसलिये कर रही हो?’

अन्जना ने महामुनि के चरणों में प्रणाम कर अत्यन्त विनम्रता से उत्तर दिया-‘मुनीश्वर! केसरी नामक श्रेष्ठ वानर ने मेरे पिता से मुझे माँगा। उन्होंने मुझे उनकी सेवा में समर्पित कर दिया। मैं अपने पतिदेव के साथ बहुत दिनांे से अत्यन्त सुखपूर्वक रह रही हॅूं; किंतु अबतक मुझे कोई संतान नहीं हुई। इसी कारण मैंने किष्किन्धा में अनेक व्रत, उपवास तथा तप किये; परंतु मुझे पुत्र की प्राप्ति नहीं हो सकी। अतएव दुःखी होकर मैंने पुत्र के लिये पुनः तपश्चर्या प्रारम्भ की है। विप्रवर! आप कृपापूर्वक मुझे यशस्वी पुत्र प्राप्त होने का उपाय बताइये।’

तपोधन मतंगमुनि ने अन्जना से कहा-‘तुम वृषभाचल (वेंकटाचल) पर जाकर भगवान् वेंकटेश्वर के भुक्ति मुक्ति-दायक चरणों में प्रणाम करों। फिर वहाॅं से कुछ ही दूर आकाशगंगा नामक तीर्थ में जाकर स्नान कर लो। तदनन्तर उसका शुभ जल पीकर वायुदेव को प्रसन्न करो। इससे तुम्हें देवता, राक्षस, मनुष्य से अजेय तथा अस्त्र-शस्त्रों से भी अवध्य पुत्र प्राप्त होगा।’
देवी अन्जना ने महामुनिके चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने वृषभाचल की यात्रा की। वहाँ पहुँचकर भगवान् वेंकटेश्वर के चरणों की अत्यन्त भक्तिपूर्वक वन्दना की। इसके बाद उन्होंने ‘आकाशगंगा’ नामक तीर्थ में स्नान कर उसके परम पावन जलका पान किया। फिर उसके तटपर तीर्थकी और मुॅंह करके वायुदेवता की प्रसन्नता के लिये अत्यन्त संयमपूर्व तपश्यरण प्रारम्भ किया। अन्जना अत्यन्त श्रद्धा, विश्वास एवं धैर्यपूर्वक तप करती रहीं, शारीरिक कष्टों की तनिक भी चिन्ता न कर वे अखण्ड तप करती ही रहीं।

भगवान सूर्य मेषराशिपर थे। चित्रानक्षत्रयुक्त पूर्णिमा तिथि थी। अन्जना के कठाोर तपश्चरण से तुष्ठ वायुदेवता प्रकट् हो गये। उन्होंने अन्जना से कहा-‘देवि! मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त प्रसन्न हॅूं। तुम इच्छित वर माॅगो; मैं उसे अवश्य पूर्ण करूॅंगा।’
वायुदेवका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त कर प्रसन्न अन्जना ने उनके चरणों में प्रणाम कर अपना मनोरथ प्रकट कर दिया-‘महाभाग! मुझे उत्तम पुत्र प्रदान कीजिये।’

संतुष्ट वायुदेवने कहा-‘सुमुखि! मैं ही तुम्हारा पुत्र होकर तुम्हें विश्वविख्यात कर दूॅंगा।’
वर प्राप्त करके अन्जना देवी की प्रसन्नता की सीमा न रही। अपनी प्राणप्रिया की वर-प्राप्ति का संवाद पाकर कपिराज केसरी भी अत्यन्त मुदित हुए।

3-एक बार की बात है। परम लावण्यवती विशाललोचना माता अन्जना ने श्रंगार किया। उनके सुन्दर कलेवर पर पीली साड़ी शोभा दे रही थी। साड़ी का किनारा लाल रंगका था। वे विविध सुगन्धित सुमनों के अदभुत आभूषणों से दिव्य सौन्दर्य की संजीव प्रतिमा-सी प्रतीत हो रहीं थीं।

माता अन्जना पर्वत-शिखर पर खड़ी होकर प्राकृतिक सौन्दय देख-देखकर मन-ही-मन मुदित हो रही थीं। उस समय उनके मन में कामना उदित हुई-‘कितना अच्छा होता, यदि मेरे एक सुयोग्य पुत्र होता।’

सहसा वायु का तीव्र झोंका आया और अन्जना की साड़ी का अच्चल कुछ खिसक गया। उनके अंग दीखने लगे। अन्जनाने अनुभव किया, जैसे मुझे कोई स्पर्श कर रहा है।

सहमती हुई सती अन्जना ने अपना वस्त्र सँभाला और अपना स्पर्श करने वाले को डाँटते हुए कहा-‘कौन ढीठ मेरे पातिव्रत्यका नाश करना चाहता है?’ वे शाप देने के लिये प्रस्तुत हो गयीं।

परम सती अन्जना को क्रुद्ध देखकर पवनदेव प्रकट हो गये।

उन्होंने कहा-‘यशस्विनि! मैं तुम्हारे एक पतिव्रतका नाश नहीं कर रहा हँू। अतः तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये। मैंने अव्यत्करूप से तुम्हारा आलिंगल करके मानसिक संकल्प द्वारा तुम्हें बल-पराक्रम से सम्पन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्रदान किया है। तुम्हारा पुत्र महान्, धेर्यवान्, महातेजस्वी, महाबली, महापराग्रमी तथा लाँघने और छलाँग मारने में मेरे ही समान होगा।’

माता अन्जना प्रसन्न हो गयीं। उन्होनें पवनदेव को क्षमा कर दिया। अन्जना गर्भवती हुईं। कपिराज केसरी की प्रसन्नता की सीमा न थी।
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4-’अधिक आयु बीत जाने पर भी कोई संतान न होने से रघुकुलशिरोमणि राजा दशरथ के मनमें अत्यधिक ग्लानि हुई। उन्होंने वसिष्ठजी के आदेशानुसार महर्षि ऋष्यश्रृंग के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। ऋषि ने भक्ति पूर्वक आहुतियाँ दीं। इससे प्रसन्न होकर अग्निदेव हाथ में चरू (हविष्यान्न, खीर) लिये प्रकट हुए और उन्होंने राजा दशरथ से कहा-‘तुम्हारे कार्य की सिद्धि हो गयी। अब तुम इस खीर को रानियों में यथाक्रम बाँट दो।’ अग्निदेव अन्तर्धान हो गये।

राजा दशरथ ने पायस का आधा भाग बड़ी रानी कौसल्या को दिया और शेष आधे के दो भाग किये, जिनमें से एक भाग कैकेयी को दिया। शेष के दो भाग हुए और राजा ने उनको कौससल्या एवं कैकेयी के हाथ पर रखकर, उनका मन प्रसन्न कर अर्थात उनकी अनुमति से सुमित्रा को दे दिया।

कैकेयी हाथ में पायस लिये हुए कुछ विचार कर रहीं थी कि सहसा आकाश से एक गृध्री ने झपटकर चरूको अपनी चोंच में ले लिया और वह तुरंत आकाश में उड़ गयी।

अब तो कैकेयी व्याकुल हो गयीं। तब महाराज दशरथकी प्रेरणा से कौसल्या तथा सुमित्रा ने अपने चरूका थोड़ा-थोड़ा भाग कैकेयी को दिया। तीनों रानियाँ गर्भवती हुईं। महारानी कौसल्या के अंक में श्री रामचन्द्रजी, कैकेयी की गोद में भरत जी एवं सुमित्रादेवी को कृतार्थ करने के लिये लक्ष्मण जी और शत्रुघन जी प्रकट हुए।

कपिराज केसरी अपनी सुन्दरी सहधर्मिणी अन्जना के साथ सुमेरूपर्वत पर निवास करते थे। अन्जना ने पुत्र की प्राप्ति कि लिये सात सहस्त्र वार्षो तक कर्पूरगौर उमानाथ की उपासना की। प्रसन्न होकर आशुतोष ने अन्जना से वर माँगने के लिये कहा।
अन्जना ने सर्वलोकमहेश्वर के चरणों में प्रणाम कर अत्यन्त विनयपूर्वक याचना की-’करूणामय शम्भो ! मैं समस्त सद्गुणों से सम्पन्न योग्यतम पुत्र चाहती हँू।’

प्रसन्न भोलेनाथ ने कहा-‘एकादश रूद्रों में से मेरा अंश ग्यारहवाँ रूद्ररूप ही तुम्हारे पुत्र के रूप में प्रकट होगा। तुम मन्त्र ग्रहण करो। पवन देवता तुमें प्रसाद देंगे। पवन के उस प्रसाद से ही तुम्हें सर्वगुणसम्पन्न पुत्र की प्राप्ति होगी।’

पार्वतीश्वर अन्तर्धान हो गये और भगवती अन्जना अज्जलि पसारे शिव-प्रदत्त मन्त्र का जप करने लगीं। उसी समय उक्त गृध्री कैकेयी के भाग का पायस लिये आकाश में उड़ती हुई जा रही थी। सहसा झंझावात आया। गृध्री का अंग सिकुड़ने लगा और पायस उसकी चोंच से गिर गया। पवनदेव पहले से ही तैयार थे। उन्होंने उक्त चरू अन्जना की अज्जलि में डाल दिया। भगवान् शंकर पहले ही बता चुके थे; अन्जना ने तुरंत पवन-प्रदत्त चरू अत्यन्त आदरपूर्वक ग्रहण कर लिया और वे गर्भवती हो गयी।

श्री हनुमान का अवतरण

चैत्र शुक्त 15 मंगलवारकी पवित्र वेला थी। भगवान शिव अपने परमाराध्य श्री रामकी मुनि-मनामोहिनी अवताल-लीला के दर्शन एवं उसमें सहायता प्रदान करने के लिये अपने अंश ग्यारहवें रूप से इस शुभ तिथि और मुहूर्तमें माता अन्जना के गर्भ से पवन पुत्र महावीर हनुमान के रूप में धरती पर अवतरित हुए। कल्पभेद से कुछ लोग इनका प्रकटय-काल चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन मघा नक्षत्र में मानते हैं, कुछ कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को और कुछ कार्तिक की पूर्णिमा को पवन-पुत्र का जन्म मानते हैं। कोई मंगलवार तो कोई शनिवार को उनका जन्म-दिन स्वीकार करते हैं। भावुक भक्तों के लिये अपने आराध्य की सभी पुणमयी तिथियाँ श्रेष्ठ हैं।

भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्रावतान-मारूतात्मज, केसरी-किशोर, अन्जना-नन्दन के धरती पर चरण रखने के समय प्रकृति पूर्णतया रम्य हो गयी थी। दिशाएँ प्रसन्न थीं। सूर्यदेव की किरणें सुखद-शीतल थीं सरिताओं में स्वच्छ सलिल बहने लगा था। पर्वत उत्सुक नेत्रों से आन्जनेय के आगमनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रपात प्रसन्नता से उछलते हुए गतिशील थे। वनों, उपवनों, बागों और वाटिकाओं में विविध रंग के मनोहर पुष्प खिल उठे थे; उनपर भ्रमरावली गुज्जार कर रही थी मदमत्त वायु मन्थर गति से डोल रहा था।

भगवान् शंकर माता अन्जना के लाल के रूप में प्रकट हुए। प्राकट्य-काल में ही हनुमानजी का सौन्दर्य अतुलनीय एवं अवर्णनीय था। उनकी अंग-कान्ति पिंगलवर्ण की थी। उनके रोम, केश एवं नेत्र भी पिंगलवर्ण के ही थे। हनुमानजी विद्युच्छटा-तुल्य सुवर्णनिर्मित मनोहर कुण्डल धारण किये हुए ही माता अन्जना की कु़िक्ष से अवतरित हुए। उनके मस्तकपर मणि-जटित टोपी शोभा दे रही थी और वे कौपीन एवं कछनी काछे हुए थे। उनके प्रशस्त वक्ष पर यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था एवं हाथ में वज्र और कटिप्रदेश में मूँज की मेखला सुशोभित थी। अपने पुत्र का अलौकिक रूप-सौन्दर्य देखते ही माता अन्जना आनन्द-विभोर हो गयीं।

भाग्यवती धरित्री पर हनुमानजी के चरण रखते ही माता अन्जना कपिराज केसरी के आनन्द की तो सीमा ही नहीं थी, चतुर्दिक् हर्षोल्लास की लहरें दौड़ पड़ी। देवगण, ऋषिगण, पर्वत, प्रपात, सर, सरिता, समुद्र, पशु-पक्षी और जड़-चेतन ही नहीं, स्वयं माता वसुंधरा पुलकित हो उठीं। सर्वत्र हर्ष एवं उल्लास प्रसारित था। चतुर्दिक् आनन्द का साम्राज्य व्याप्त हो गया था।

प्रेमीजनों को मेरा सादर- जय सियाराम। जय हनुमान।
लेखक-अनिल यादव।

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