hanuman ji mandir

1. श्री कष्टभंजन हनुमानजी, सारंगपुर।
2. श्री साभ्रमती हनुमानजी, अहमदाबाद।
3. श्री खाण्डनिया हनुमानजी, सूरत।
4. श्री हनुमानधारा, गिरनार, जूनागढ़।
5. श्री एकादशमुखी हनुमानजी, पोरबंदर।
6. श्री दाण्डिया हनुमानजी, जामनगर।
7. श्रीमकरध्वज के साथ श्रीहनुमान, बेट द्वारिका।
8. श्री भूरखिया हनुमानजी, लाठी।
9. श्री लंबे हनुमानजी, भवनाथ, गिरनार, जूनागढ़।

भारतवर्ष के गुजरात प्रान्त में श्रीहनुमानजी के अत्यधिक मन्दिर हैं। मैं गुजरात प्रदेश के बहुत से शहरों कस्वों एवम ग्रामों में गया। मैने देखा कि श्रीहनुमानजी के मन्दिर प्रत्येक मोहल्लों ग्रामों एवं गलियों में जरा-जरा सी दूरी पर स्थित हैं। मुझे जो अहसास हुआ कि गुजरात के लोगों ने गुजरात की तरक्की, सुरक्षा, व्यापार बृद्धि, सुख-समृद्धि, जनकल्याण एवं कष्टनिवारण हेतु श्रीहनुमानजी के अत्याधिक मंदिरों का निर्माण एवं प्राण प्रतिष्ठा करायी है। यही बजह है कि गुजरात प्रान्त समृद्ध प्रदेश है।
मैं आपको गुजरात के प्रमुख 09 श्रीहनुमान मंदिरों के चमत्कार बताता हूँ-
(1) श्री कष्टभंजन हनुमानजी, मंदिर सारंगपुर-
सारंगपुर, गुजरात में श्रीकष्टभंजन-मारूति की बहुत ही प्रसिद्ध प्रतिमा है। ज्यादातर लोंगों ने कहीं न कहीं सोशल मीडिया या आनलाईन दर्शन जरूर किये होंगे। श्री सारंगपुर के श्रीहनुमानजी के इस स्थान पर जाने के लिये आपको अहमदाबाद-भावनगर रेलवे लाइन पर बोटाद जंकशन उतर कर लगभग 20 कि0मी0 अन्य रोड ट्रान्सपोर्ट जैसे बस या लोकल साधन का उपयोग करना होगा। अहमदाबाद से सारंगपुर 140 कि0मी0, राजकोट से सारंगपुर 135 कि0मी0, अहमदाबाद से सारंगपुर 140 कि0मी0, बरोडा से सारंगपुर 250 कि0मी0 है।
गुजरात के महायोगिराज गोपालानन्द स्वामी ने श्रीकष्टभंजन-मारूति, सारंगपुर की प्राणप्रतिष्ठा विक्रम संवत् 1904 आश्विन महीने कृष्ण पक्ष तिथि पंचवी के दिन की थी। प्राणप्रतिष्ठा के समय मूर्ति में श्रीहनुमान का आवेश हुआ और यह हिलने लगी। तभी से श्री कष्टभंजन -श्रीहनुमानजी, सारंगपुर की सर्वत्र मान्यता हो गयी। लाखों की संख्या में हिंन्दू-मुसलमान इस सिद्ध विग्रह के चमत्कारों से चकित होते रहते हैं।
(2)श्री साभ्रमती(साम्बरमती)हनुमानजी, अहमदाबाद-
श्री साभ्रमती हनुमानजी का मंदिर लगभग 250 वर्ष पुराना मंदिर है। यहाँ की मूर्ति इतनी भव्य एवं आकर्षक है कि आपका चित्त हटेगा ही नहीं। अहमदाबाद कैंट  में साबरमती के तटपर पर श्रीहनुमानजी का विशाल मंदिर है। प्रत्येक शनिवार एवं मंगलवार के सायंकाल यहाँ मेला-सा लग जाता है। लगभग 30-35 वर्ष पूर्व रात के बाहर बजे इस मंदिर में एक चमत्कार हुआ। आस-पास के लोग सो  रहे थे। अश्विन कृष्णचतुर्दशी, मंगलवार की रात के बारह बजे एक भयंकर आवाज हुई, मानो तोप से गोला छूट गया हो! लोग एकत्र हो गये, किन्तु कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। प्रातः छः बजे पुजारीजी ने जब मंन्दिर खोला तो वे देखते क्या हैं कि श्रीहनुमानजी के अंग पर से प्रायः 8-10 इंच की चांैडी आँगी (आवरण) छिन्न-भिन्न होकर नीचे गिर पड़ी है और भव्य एवं सुन्दर साकार मूर्ति प्रत्यक्ष हो गयी है। आवरणको दूर करके देखने से पता चला कि यह आवरण वार्षनुवर्ष चढ़ते हुए तैल और सिन्दूर की जमती हुई पर्त था। लोग दर्शन करने के लिये उमड़ पडे़। यह प्रचीन मूर्ति बड़ी भब्य है। उसके बाद जनता की ओर से वहाँ विशाल श्रीरामयज्ञ किया गया। तब इस मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती ही चली गयी। प्रति दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते हैं।
  (3) श्री खाण्डनिया हनुमानजी, सूरत-
श्री खाण्डनिया हनुमानजी, सूरत तापी नदी के किनारे टीले पर स्थित हैं। श्री हनुमानजी का यह स्थान बहुत ही प्रसिद्ध है। एक बार विक्रम सं0 1932 में तापी नदी में बड़ी भयंकर बाढ़ आयी। सारा सूरत शहर बाढ़ग्रस्त हो गया। निराधार लोग मकानों की छतपर अथवा पहाड़ के ऊपर आश्रय लेने लगे। कुछ लोगों ने शहर के बीच में स्थित एक टीले के ऊपर भी आश्रय लिया। तीसरे दिन प्रातःकाल लोगों को श्रीहनुमानजी की एक विशालमयी मूर्ति दिखायी दी, जो बाढ़ के जल से बहकर वहाँ आ गयी थी। आश्चर्य तो यह था कि मूर्ति के एक भाग में ऊखल (कूटने वाला) बँधा था। लोगों ने उन्हें उठाकर एक पुरानी झोपड़ी में प्रतिष्ठित किया।
इसके बाद वि0सं0 1940 में सूरत में भयंकर अग्निकाण्ड हुआ। आसपास के सभी मकान भस्मसात् हो गये, किंतु बाँस से बने हुए इस मंदिर को जारा सी आँच नहीं आयी। उस समय के अंग्रेज जिलाधीश ने श्रीहनुमानजी को मस्तक झुकार उसी स्थान पर मंदिर बनवाने की अनुज्ञा दे दी। मंदिर तैयार होने पर मूर्ति को मंदिर में पधराने के लिये दस-बीस आदमी इकट्ठे होकर उठाने लगे, किंतु मूर्ति उठ न सकी। उसी समय मंदिर के पुजारी श्री नरोत्मजी ने आकर ‘जयबजरंग’ के घोष के साथ अकेले ही उसे उठाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया। सूरत के भक्तलोग इस श्रीविग्रह का अत्यन्त श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करते हैं।
(4) श्री हनुमानधारा, गिरनार, जूनागढ़- 
श्री हनुमानधारा, मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र में गिरनार, जूनागढ़ क्षेत्र में स्थित है। गिरनार पर्वत के ऊपर वायव्य कोण में 1500 सीढियाँ चढ़ने पर नीचे के भाग में यह एतिहासिक प्रचीन स्थान है यह पूरा क्षेत्र घने जंगल से घिरा हुआ हैं। इसलिये इस स्थान पर अत्यन्त रमणीय और आकर्षक लगता है। अब रास्ता सरल बन जाने कारण गिरनार एवं दूर-दूर के बहुत-से यात्री श्रीहनुमानजी के दर्शन करने प्रतिदिन आते हैं। यहाँ एक विशाल कुण्ड भी है। इस कुण्ड का सम्पूर्ण जल किनारे पर स्थित श्रीहनुमानजी के मुख से ही निकलता है। इसी कारण इस स्थान का नाम ‘हनुमानधारा’ पड़ा है। लगभग 450 वर्ष पूर्व इस स्थान पर एक गोवर्धनदासजी नाम खाकी संत निवास करते थे। कहते हैं कि बाबाजी प्रायः 3-4 मन (100-150 किलो) लोहे के आभूषण धारण करके एक हाथ में 7 फीट का लोहे का चिमटा लिये हुए सांय-प्रातः  आरती करते थे। आज भी बाबाजी के वह आभूषण (कटि प्रदेश में धारण करने की एक मन की लोहे की जींज, हाथ-पेर के कड़े और चिमटा) यथावत् मौजूद हैं। इसलिये स्थान काफी ज्यादा सिद्ध है और प्रसिद्ध है।
(5) श्री एकादशमुखी हनुमानजी, पोरबंदर-
सुदामापुरी के बारे में कोई नहीं जानता। सुदामापुरी मतलब पोरबंदर जी हाँ, गुजरात प्रान्त के सौराष्ट्रअंतर्गत सुदामापुरी के श्रीसुदामा-मंदिर के पश्चिम की ओर अति प्राचीन एकादशमुखी श्री हनुमानजी का मंदिर है। मूर्ति के दो चरण वाईस हाथ एवं ग्यारह मुख हैं। सारे गुजरात में ऐसा यह एक ही मंदिर है। पौराणिक प्रसंगानुसार अहिरावण-बध के समय देवी-मंदिर में श्री हनुमानजी ने ग्यारह मुख प्रकट किये थे। उसके बाद अहिरावण का बध होने पर श्रीहनुमानजी ने पाताल नगरी का राज्य अपने औजस पुत्र मकरध्वज को प्रदान किया था। आज भी यहाँ के महाराण लोग अपने को मकरध्वज का वंशज मानते हैं। इसलिए यह स्थान बहुत ही प्रसिद्ध स्थान है। दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिये आते हैं।
(6) श्री दाण्डिया हनुमानजी, जामनगर-
श्री दाण्डिया हनुमानजी, जामनगर, जूनागढ़ के प्रसिद्ध पर्वत गिरनार की वन्य स्थली श्री हनुमानधारा के हनुमानजी की कृपा से ही जामनगर-राज्य के संस्थापक श्री जामराओल को जामनगर का राज्य प्राप्त हुआ था। श्रीहनुमानधारा के मारूतिदेव के प्रत्यक्ष दर्शन के बाद श्री जामराओल ने श्री हनुमानजी से जामनगर पधारने की प्रार्थना की। वे ही श्री हनुमानजी जामनगर पधारे और उसकी चारों दिशाओं में क्रमशः प्रतिष्ठित हुए। जहाँ-जहाँ उन्होंने विश्राम किया, वहाँ-वहाँ लोगों ने श्रीहनुमानजी के विभिन्न मन्दिरों का निर्माण कराकर उनमें विभिन्न नामों से उनकी प्रतिष्ठा की इस प्रकार श्री हनुमानजी दाण्डिया हनुमान, फुलिया हनुमान, भीड़ भंजन हनुमान आदि नामों से प्रसिद्ध हुए। इनमें दाण्डिया हनुमान का मंदिर भव्य एवं चमत्कारिक माना जाता है। इस स्थान पर दर्शन हेतु श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
(7) श्री मकरध्वज के साथ श्रीहनुमान, बेट द्वारिका-
बेट द्वारिका से लगभग 6 कि0मी0 की दूरी यपर मकरध्वज के साथ में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित हैं कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी, परंतु अब दोनों मूर्तियाँ एक-सी ऊँचीं हो गयी हैं। अहिरावण ने भगवान् श्रीराम-लक्ष्मण को इसी जगह पर छिपा रखा था। जब हनुमानजी श्रीराम -लक्ष्मण को लेने के लिये आये, तब उनका मकरध्वज के साथ घोर युद्ध हुआ। अन्तमें हनुमानजी ने उसे परास्त करके उसी की पूँछ से उसे बाँध दिया। जब मकरध्वज ने अपनी पहचान बतायी, तब उन्होंने उसे मुक्त कर दिया। उनकी स्मृति में यह मूर्ति स्थापित है। यहाँ हनुमान टेकरी और हनुमान अन्तरीप में भी श्रीहनुमानजी के प्रसिद्ध मंदिर हैं। श्रद्धालु भक्त यहाँ पर सभी मंदिरों पर दर्शनार्थ आते ही रहते हैं।
(8) श्री भूरखिया हनुमानजी, लाठी-
श्री भूरखिया हनुमानजी, का मंदिर सौराष्ट्र के लाठी शहर से लगभग 10 कि0मी0 पर स्थित है। इसी नाम पर यहाँ गाँव बस गया है। प्रचीन काल में रामानन्द सम्प्रदाय के प्रभावशाली महंत श्रीरघुवीरदास जी के शिष्य श्री दामोदरदास जी को स्वप्न में श्रीहनुमानजी ने आदेश दिया कि चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को आधी रात के समय मैं सभाड़ तथा लाठी शहर के बीच निर्जन वन में प्रकट होऊँगा। महात्मा दामोदरदास जी अपने पूज्य गुरूदेव से आज्ञा लेकर पूजन-सामग्रीसहित कुछ लोगों के साथ पैदल चल पड़े। वि0से0 1642 मंगलवार चैत्र शुक्ल पूर्णिमा की आधी रात के समय उस जनशून्य जंगल में बड़े जोर से धमाके के साथ एक टीले से धूल उड़ी। कुछ क्षणों के बाद उपस्थित जनों को वहाँ श्रीहनुमानजी की मूर्ति दिखायी पड़ी। सभी ने जय-जयकार के साथ उनका पूजन-अर्चन किया। तभी से इनका नाम भूरखिया पड़ गया, भूरखिया का अर्थ है-भूमि की रक्षा करने वाला। सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले होने के कारण इस क्षेत्र में भूरख़िया हनुमानजी की बड़ी प्रसिद्धि है। श्रद्धालू दूर-दूर से दर्शन हेतु आते हैं।
(9) श्री लंबे हनुमानजी, भवनाथ, गिरनार, जूनागढ़- 
जूनागढ़ गिरनार का दरवाजा कहा जाता है। गिरनार पर्वत अत्यन्त पवित्र है। इसकी तलहटी मेें भवनाथ से आगे लंबे हनुमानजी का मंदिर है। मंदिर में यात्रियों के ठहरने की भी व्यवस्था है। यहाँ हनुमानजी के महोत्सव होते ही रहेते हैं। योगियों की यह अत्यन्त सम्मान्य तपोभूमि है। योगी राजा मुचुकुन्द-महादेव की परिक्रमा में पंचमुखी श्रीहनुमान का मंदिर है तथा सातपुड़ा कुण्ड से आगे भी श्रीहनुमानजी एक स्थान है।
यदि आप गुजरात यात्रा का प्लान कर रहें हैं उपरोक्त सिद्ध श्रीहनुमान जी स्थानों पर दर्शन करने का प्लान बना सकते हैं।
समस्त पाठकबन्धुओं को जय सियाराम जय हनुमान। 
लेखक-अनिल यादव। 

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