दुर्लभ मनुष्यदेह बार-बार नहीं मिलता। इसलिये हृदय में हरि-नाम से प्रेम धारण करने का प्रयत्न कीजियेे और एक बार दृढ़ निश्चिय कर लो कि प्रभु-प्राप्ति करके ही रहूँगा। फिर ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो तुम्हें प्रभु-प्राप्ति के मार्ग से हटा दे। भगवत्साक्षत्कार करके मानव जीवन को धन्य तथा सफल बनाना है इसके लिये आयुवृद्धि और स्वास्थ्य-रक्षा के लिये प्रयत्नशील रहना हम सभी का कर्तव्य है-

आचार्य कहते हैं- ‘इंद शरीरं खलु धर्मसाधनम्।’
तथा-

धर्मार्थकाममोक्षणां शरीरं साधनं यतः।
सर्वकार्येष्वन्तरंगडं शरीरस्य हि रक्षणम्।।

‘धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों पुरूषार्थोें की प्राप्ति के लिये निरोग तथा स्वस्थ शरीर ही मुख्य साधना है। इसलिये शरीकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये।’ वेद में भी दीर्घ जीवन की प्राप्ति के लिये बार-बार कहा गया है-

     स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्।। (अथर्ववेद)

ब्राह्मणों को पवित्र करनेवाली, वरदान देने वाली माता गायत्री की हम स्तुति करते हैं। वे हमें आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करके ब्रह्मलोक में जायें।’

इस मन्त्र में सबसे प्रथम आयु का उल्लेख किया गया है। आयु के बिना प्रजा, कीर्ति, धन आदि का कुछ भी मूल्य नहीं है। आत्मा के बिना देह का कोई मूल्य नहीं। यही बात आयु के विषय में है। सौ वर्ष की आयु के लिये अनेक प्रार्थनाएँ देखने में आती हैं।

दीर्घ जीवन के लिये अथवा मृत्यु को दूर करने के लिये छः बाते आवश्यक हैं- (1) ब्रह्मचर्य, (2) प्रणायाम, (3) प्रणव-जप, (4) सिद्ध पुरूषकी कृपा, (5) ओषधि तथा रसायन-सेवन और (6) मिताहार। आयुकी रक्षा और वृद्धि के ये छः स्तम्भ हैं।

ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवभ्यः स्वराभरत्।।
(अथर्ववेद)

‘ब्रह्मचर्यरूपी तपसे विद्वानों ने मृत्यु को दूर हटा दिया। इन्द्र ने भी ब्रह्मचर्य के प्रताप से देवताओं को सुख और तेज प्रदान किया।’ यह मन्त्र आज्ञा देता है कि मृत्यु को दूर करने के लिये ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करो। ब्रह्मचर्य की महिमा को मनुष्य ने जबसे भुलाया, तभी से उसका अधःपतन आरम्भ हो गया। जीवन में उबाल, मेधा की अप्रतिम शक्ति, जीवन की मस्ती, योवन का सात्विक उल्लास, आकृति का ओजस्, वाणी की दृढ़ता, कार्य की दृढ़ता, सच्चे साहस की स्वाभाविकता, जीवन में चापल्य और चांचल्य- ये सब पूर्ण ब्रह्मचर्य के चिन्ह हैं।

वैज्ञानिकों ने यह निश्चय किया है कि 80 पाउंड भोजन से 80 तोला खून बनता है और 80 तोला खून से दो तोला वीर्य बनता है। एक महीने की कमाई डेढ़ तोला वीर्य है। एक बार ब्रह्मचर्य-भंग होने से लगभग डेढ़ तोला वीर्य निकलता है इससे आयु घटती जाती है। कठिन परिश्रम से प्राप्त की हुई शक्ति को एक बार में नष्ट कर देना कैसी मूर्खता है। यही वीर्य यदि नष्ट न हो, तो ओजस् बनकर सारे शरीर को तेजस्वी बना देता है। इसी कारण कहा है-

‘मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधारणात्।’
‘वीर्य का नाश मृत्यु है और वीर्य की रक्षा जीवन है।’

गुरूके सांनिध्य में रहकर प्राणायाम करना सीखना चाहिये और फिर उसका उभ्यास बढ़ाना चाहिये। स्वरोदय के अनुसार एक दिन में अर्थात् चैबीस घंटे में मनुष्य के औसत इक्कीस हजार छः सौ श्वास चलते हैं। उनमें जितनी कमी की जाय उतनी ही आयु घट जाती है।

मैथुनक्रिया, क्रोध, उत्तेजना, हिंसा, आवेश, अतिहर्ष, दौड़ना आदि में श्वास जल्दी-जल्दी चलकर बढ़ जाते हैं, जिससे आयु घटती है और प्राणायाम, ध्यान, शान्ति, क्षमा, ब्रह्मचर्य, नम्रता, धीरे-धीरे चलना आदि में श्वास धीमी गति से चलते हैं, अतः आयु बढ़ती है। आयु की अवधि श्वासों पर निर्धारित है, कालपर नहीं। आयु के घटने-बढ़ने का यह रहस्य निरन्तर स्मरण रखना चाहिये। मनुष्य को जहाँ तक हो सके, जल्दी-जल्दी और लघु श्वास नहीं लेना चाहिये, प्रत्युत ऐसी आदत डालनी चाहिये कि श्वास लंबा हो और धीरे-धीरे चले। प्राणायाम इसका एक मुख्य साधन है। परन्तु प्रत्येक मनुष्य प्राणायाम नहीं कर सकता, इसलिये दीर्घ श्वास-प्रश्वास की क्रिया नीचे लिखे अनुसार करने से उद्देश्य की सिद्धि हो सकती है।

प्रत्येक मनुष्य को प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिये। मल-मूत्र का त्याग करके स्नान करे। तत्पश्चात् पृथ्वी पर कम्बल या दरी बिछाकर सिरके नीचे बिना कोई तकिया रखे लेट जाय। हाथ-पैर को ढीला रखे। कमर का बन्धन ढीला करे और मुँह बंद करके नाक से श्वास ले। श्वास इस प्रकार ले कि नाभि के साथ-साथ पेट फूलता जाय। इस प्रकार पेट भर जाने पर मुँह बंद रखते हुए नाक के द्वारा यों श्वास छोडे़ कि धीरे-धीरे पेट बेठता चला जाय। नाक से श्वास लेने और छोड़ने का समय एक-सा होना चाहिये। परन्तु यह समय घड़ी से मापना ठीक नहीं। प्रभु की प्रार्थना से एक चरण-पद लेकर मनमें एक बार जब तक पाठ होता रहे, तब तक श्वास छोड़े। इसके बाद जैसे-जैसे अभ्यास बढ्ता जाय, वैसे-वैसे प्रार्थना के पाठकी मात्रा बढ़ाता जाय। उसका दूसरा चरण ले ले (अथवा प्रार्थना के स्थान में भगवान् नाम का जप करता रहे)। अर्थात् जितने समय में चैबीस अक्षर का उच्चारण हो, उतने समय तक श्वास लेने और उतने ही समय तक श्वास छोड़ने का अभ्यास करें। इस प्रकार कम-से-कम सात बार और अधिक-से अधिक इक्कीस बार श्वास लेने-छोड़ने का नियमित अभ्यास करें। यह विशेष रूप से याद रखे कि श्वास लेने में वायु नाभिपर्यन्त पहुँचता है या नहीं और श्वास छोड़ते समय नाभि खाली हो जाती है या नहीं। इस प्रकार क्रिया करने के बाद दिन-रात यह ध्यान रखें कि श्वास छोटा तो नहीं हो रहा है। इसकी परीक्षा स्वयं ही की जाती है। यदि यह क्रिया बराबर होती रहेगी तो इसे करने वाले का मल साफ उतरेगा, पेशाब ठंडा होगा, भूख लगेगी। खाया हुआ भोजन अधिक पचेगा, आँख का तेज बढ़ेगा। सिरमें आने वाला चक्कर और दिमाग की गरमी शान्त होगी। शरीर में शक्ति बढ़ने लगेगी।

किंतु यह क्रिया ठीक न होती होगी तो श्वास लेने की अपेक्ष छोड़ने में समय कम लगेगा। ऐसी अवस्था में उपयुक्त गुणों की अपेक्षा विरूद्ध परिणाम निकलेगा। यदि कभी आवश्यक कार्यवश अधिक श्रम होने के कारण श्वास जोर-जोर से चलने लगे तो घबराकर मुँह से श्वास न ले। अपितु मुँह बंद रखकर नाक से श्वास लेते रहने से थोड़ी देर में श्वास नियमित हो जायगा और थकावट दूर हो जायगी।

जैसे-जैसे नाभि से श्वास निकालकर बाहर हवा में फेंका जायगा और बाहर हवा में शुद्ध हुए श्वास को नाक के द्वारा नाभिपर्यन्त पहुँचाया जायगा, वैसे-वैसे विष्णुपादामृतकी प्राप्ति अधिकाधिक होती जायगी; इस प्रकार दीर्घ जीवन प्राप्त करने में सफलता मिलेगी।

प्रणव (प्राणायाम)-मंत्र के जप से आयु बढ़ती है तैलधारावत् (लगातार, जैसे तेल की धारा नहीं टूटती बीच से) इस मन्त्र का जप श्वास-श्वास में चलना चाहिये। नाडी के साथ प्रणव-मन्त्र का जप करने से बहुत शीघ्र प्रगति होती है। श्वास-प्रश्वास की गति तालबद्ध बनती है। धातु और रसायन के विशेष योग से विद्युत-शक्ति प्रकट होती है। इसी प्रकार श्वास-प्रश्वास के साथ प्रणव-मन्त्र का जप करने से मन उसमें स्थिर हो जाता है। जैसे चुंबक के सामने लोहा रखने से तुरंत ही वह लोहे को खींच लेता है, केवल चुंबक की शक्ति के पास लोहा आना चाहिये; इसी प्रकार अखण्ड प्रणव-मन्त्र जप चुंबक के समान है, चित्तवृत्तियाँ लोहे के समान हैं। ये दोनों समीप आ जायँ तो प्रणव-मंन्त्र का जप वृत्तियों को खींच लेता है और वृत्तियाँ प्रणवमय बन जाती हैं। इस प्रकार दीर्घ जीवन और प्रभु-प्राप्ति की साधना-दोनों साथ-साथ आगे बढ़ते हैं और जीवन का ध्येय सफल जो जाता है।
सिद्ध पुरूष की कृपा भी इसमें विशेष रूप से सहायक होती है। यदि ऐसे पुरूष की कृपा हो तो दीर्घ जीवन और प्रभु-प्राप्ति दोनों ही सत्वर प्राप्त होते हैं।

मुमुक्षु आत्मसाक्षत्कार तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। परंतु इसका साधन भी शरीर ही है। यदि बीच में ही शरीका पतन हो जाय तो अन्तिम लक्ष्य-स्थान तक पहुँचने में दीर्घ काल तक समय बिताना पड़ता है। बार-बार जन्म लेने और देह-त्याग करने में बहुत समय नष्ट होता है। अतएव किसी भी उपाय से शरीर सशक्त और स्वस्थ बना रहे तथा दीर्घ काल तक टिका रहे तो प्रभु की प्रप्ति में सहायक हो सकता है। शरीर को बलवान् बनाने में सहायक हो सकता है। शरीर को बलवान् बनाने में शस्त्रोक्त औषध और रसायन का सेवन भी बहुत काम करता है। कायाकल्प के प्रयोग से शरीर को फिर तरूण-जैसा बलवान् बनाया जा सकता है। अमृत पीने से यह देह अमर हो जाता है। बहुत से योगियों का मत है कि हमारे परम गुरू महन्त नृत्यगोलदास जी महाराज आज भी अपने असली शरीर से विद्यमान हैं। अश्वत्थामा के विषय में भी यही बात कही जाती है। अतएव औषध और रसरायन का सेवन करने से अपने ध्येय में पर्याप्त सहायता मिलती है।

मिताहार शरीर को स्वस्थ बनाये रखने में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करता है। मिताहार का अर्थ है- पेट में दो भाग भोजन से एक भाग जल से भरेें और एक भाग हवा के लिये खाली रखें। भौजन तभी चाहिये जब भूख लगे।

सारांस आयु की वृद्धि एवं जीवन के परम लक्ष्य प्रभुकी प्राप्ति के उपर्युक्त छः उपायों का श्रद्धा तथा दृढ़तापूर्वक पालन करके जीवन को सफल बनाना चाहिये।

सभी पाठकबन्धुओं को सादर जय सियाराम जय हनुमान।

लेखक- अनिल यादव।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *