ekadashi maiya

अधिमास की पद्मिनी एकादशी विधि श्री ब्रह्माजी बोले- हे नारदजी ! अधिमास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पद्मिनी एकादशी है। इस दिन मांस, मसूर, चना, कोदों, शहद, शाक और पराया अन्न नहीं खावे न नमक खावे, दशमी के दिन एक बार भोजन करे पृथ्वी पर शयन करें । एकादशी के दिन प्रातः उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर तीर्थ नदी में शरीर में नदी की मिट्टी लगाकर स्नान करे इससे पाप क्षय होते हैं। इसके अभाव में गंगा आदि का ध्यान करते हुए कुँआ, तालाब या बाबड़ी में स्नान करे, शुद्ध वस्त्र पहिने, संध्या तर्पण करे फिर राधाकृष्ण की प्रतिमा या शिव पार्वती की पूजा करे, रजस्वला स्त्री का स्पर्श न करे, असत्य न बोले, ब्राह्मण तथा गुरु की निन्दा न करे पुराणों की कथा सुने निर्मल व्रत करे यदि व्रती अशक्त हो तो वह फलाहार करले । प्रत्येक पहर में विष्णु या शिव की पूजा करे । पहले पहर में नारियल, दूसरे पहर में विल्व पत्र, तीसरे पहर में सीताफल, चौथे पहर में नारंगी या सुपाड़ी चढ़ावे । इसमें जागरण से पहले पहर में अग्निष्टोम यज्ञ का, दूसरे में वाजपेय यज्ञ का, तीसरे में अश्वमेध यज्ञ का और चौथे में राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इसके समान न कोई यज्ञ है, न विद्या है, न तप है, न पुण्य है इस प्रकार जागरण करना चाहिये । पश्चात् द्वादशी को स्नानादि से निवृत्त हो ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करे । अधिमास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी की भी यही विधि है ।

जय सियाराम जय हनुमान जय गुरूदेव।

लेखक अनिल यादव।

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