आरति श्री पुरुषोत्तम की कीजै,

तन मन धन न्यौछावर कीजै ॥ टेक० ॥

राधा नागर मुख की शोभा,

जाहि देखि मेरा मन लोभा ॥ आरति० ॥

गौर श्याम तन निरखत रीझै, प्रभु को रूप नयन भर लीजै ॥ आरति० ॥

फूलन हार रतन गल माला, गोपिन विच सोहैं नंदलाला ॥ आरति० ॥

शीश मुकुट पिया पिय के राजै,

कर मुरली हरि अधर बिराजै ॥ आरति० ॥

नील साड़ि पीताम्बर धारी,

राधाकृष्ण नाम गिरिधारी ॥ आरति० ॥

तेज पुञ्ज रवि शीश सम सोहें,

देखि देखि भक्तन मन मोहें ॥ आरति० ॥

शिव ब्रह्मादिक सुर मुनि गावें,

नेति नेति कहि वेद बखानै ॥ आरति० ॥

‘नवल’ जो अधिमासहि ध्यावै,

कोटि जन्म के पाप नशावै ॥ आरति० ॥

प्रेम सहित जो आरति गावै,

बस बैकुण्ठ अमर पद पावै ॥ आरति० ॥

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