lord hanuman

(1)

रामकी कृपासे पार उदधि अपार हुआ,
दर्शसे तुम्हारे अम्ब! जीवन सफल ये।
दानवों सहित नष्ट-भ्रष्ट कर दूॅं, जो कहो
पस्त कर दूॅं, मैं अभी लंकाके महल ये।
भूख भी लगी है, जाश रोष भी बढ़ा है देख-
गाज रहे सैनिक दशाननके खल ये।
आज कुछ कौतुक दिखाना चाहता हॅूं इन्हें,
खाना चाहता हॅूं वाटिकाके पके फल ये’।।

(2)

पाकर इशारा पारावार-सी बढ़ी है शक्ति,
वज्र से कठोर अंग-अंग हुए जंगीके।
पस्त हुई हिम्मत, प्रभावहीन त्रस्त दैत्य,
भाव देख विकट अड़ीले अड़भंगीके।
भाग चले बागसे अभागे भीरू रक्षक जो,
त्यागे तन, आगे जो बढ़ थे रणरंगीके।
हाड़ हिले रिपुके, पहाड़ फटने-से लगे,
सुनके दहाड़ महावीर बजरंगीके ।।

(3)

खा-खा फल मधुर, प्रशाखा और शाख तोड़,
मत्त गजराज-से विराज रहे वनमें।
शुंड-से वितुंडके लॅंगूरमें द्रुमोंके झुंड
वेगसे लपेटके उखाड़ लेते छनमें।
हूहू कर धाये जो समूह थे, पठाया उन्हें
रूष्ट मुष्टिकासे मार यमके सदनमें।
मरूतिकी मारसे कुमार वीर अक्षय भी
क्षीण हो धरा पै पड़ा प्राण त्याग रनमें।।

(4)

आया जो, सफाया हुआ उसका निमेषमें ही,
चारों ओर रूंड मुंड बिखरे विशेष थें।
विटप उजाडे़ हुए वनके पडे़ थे, मानो
लंकामयी बालाके उखाडे़ हुए केश थे।
पावोंकी धमकसे धरा थी धॅंसने-सी लगी,
भरसे अपार अकुलाने लगे शेष थे।
क्रुद्ध आज्जनेय युद्ध-ताण्डव मचाने लगे,
रावण-कुमारके लिये जो मारकेश थे।।

(5)

राक्षसोंके क्षयकी प्रथम भूमिका-सी वहाॅं
वाटी वह युद्धकी समुद्घाटिका हुई।
अंग अंग भंजित पिशाच नाच-नाच गिरे,
रक्त-राशि-रंजित घराकी शाटिका हुई।
वीर बजरंगी के प्रहारसे क्षणोंमें वहाॅं
असुर-संहारकी अनोखी नाटिका हुई।
वैरी-वनिताओंके सशोक क्रन्दनोंसे व्याप्त
शोकवाटिका-सी थी अशोकवाटिका हुई।।

(रचयिता- साहित्याचार्य पाण्डेय पं0 श्री रामनारायणदत्त शास्त्री ‘राम‘)

written by -Anil Yadav

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