lord hanuman

श्री हनुमंतलालजी विशेषरूप से श्रीराम-नाम-के कीर्तनपरायण ही रहा करते है। नाम-कीर्तन प्रारम्भ करते ही प्रेमोन्मत्त हो जाते हैं। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की झड़ी-सी लग जाती है। सम्पूर्ण श्री विग्रह के रोंगटे ऐसे सुदीप्त रूपसे खड़े हो जाते हैं। ‘पुलक सरीर पनस फल जैसा।।’
श्रीहनुमत्संहितोक्त निम्नोद्धृत श्लोक में श्री हनुमानजी अपनी रसना को आदेश दे रहे हैं-

हे जिव्हे जानकीनानेर्नाम माधुर्यमण्डितम्।
भजस्व सतत प्रेम्णा चेद्वाछंसि हितं स्वकम्।।
जिव्हे श्रीरामसंलापे विलम्बं कुरूषे कथम्।
वृथा नायाति ते किंचिद्विना श्रीनामसुन्दरम्।।

‘हे रसने! यदि तू अपना कल्याण चाहती है तो श्री जानकी-जीवन का मधुरतिमधुर ‘राम’ नाम सतत प्रेमपूर्वक रटती रह। जिव्हे! श्रीराम-नाम उच्चारण करनें में तू देर क्यों कर रही है? मधुर मनोहर श्रीराम-नाम के उच्चारण बिना तेरा क्षणमात्र भी व्यर्थ नहीं जाना चाहिये।’

श्री हनुमानजी का सिद्धान्त है– कि जीव चाहे लेटा हो या बैठा हो अथवा खड़ा ही क्यों न हो, जिस किसी भी दशा में श्री राम-नाम स्मरण करके वह भगवान्के परमपदको प्राप्त हो जाता हैै।

आसीनो व शयानो वा तिष्ठन् वा यत्र कुत्र वा।
श्रीरामनाम संस्मृत्य याति तत्परमं पदम्।।

श्रीराम-नाम को हनुमानजी ने अपना जीवनसर्वस्व मान रखा है-

केवलं रामनामैव सदा मज्जीवनं मुने

सत्यं वदामि सर्वस्वमिदमेकं सदा मम।।

‘मुने! एकमात्र श्रीराम-नाम ही मेरा जीवन हैं। मैं आपसे सत्य कहता हॅूं कि सदा-सर्वदा मेरा एकमात्र सर्वस्व श्रीराम-नाम ही है।

श्री हनुमंतलालजी के विश्वस्त हृदय- में श्रीराम-नाम का परम-तत्व ऐसा जम गया है कि इसकी तुलनामें आप अन्यान्य साधनों को अत्यल्प मानते हंै। श्री आदिरामायाणमें सेतुबन्ध प्रसंग में नल-नील को श्रीराम-नाम का उपदेश करते हुए आप कह रहे हैं-

एकतः सकला मन्त्रा एकतो ज्ञानकोटयः।
एकतो रामनाम स्यात् तदपि स्यान्न वै समम्।।
देशकालक्रियाज्ञानादनपेक्ष्यः स्वरूपतः।
अनन्तकोटिफलदो राममत्रो जगत्पतेः।।

अनन्तकोटि फल प्रदान करने वाला हैं श्रीराम-नामरूपी मन्त्र- अर्थात् तराजूके एक पलड़े पर सभी महामन्त्रों के एवं कोटि-कोटि ज्ञान-ध्यानादि साधनों के फलों को रखा जाय, दूसरे पलड़े पर केवल श्रीराम-नामको ही रखा जाय तो भी सब मिलकर श्रीराम-नाम की तुलना नहीं कर सकते। श्रीराम-नाम की आराधना में अन्य साधनों की भाॅंति देश काल की पवित्रता एवं अनुष्ठानादि क्रिया और ज्ञानकी अपेक्ष नहीं होती। उच्चारणमात्र से ही अनन्तकोटि फल प्रदान करनेवाले हैं-श्रीराम-नामरूपी मन्त्र।

सुमिर पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।।

सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र सर्वेश्वर परम प्रभु को भी वश में करने वाले श्रीराम-नाम कीर्तन की बराबरी भला अन्य साधन कैसे कर सकेंगे?

जो सदा स्नेहपूर्व श्री राम-नाम जप करते हैं उनके ऊपर तो श्री हनुमानजी लट्टू हो जाते हैं उनके लिये आप कल्पवृ़़क्ष बनकर सभी मनोरथों को सफल करते रहते हैं। आपके ही मुखसे सुन लीजिये-

ये जपन्ति सदा स्नेहान्नाम मांगल्यकारणम्।
श्रीमतो रामचन्द्रस्य कृपालोर्मंम स्वामिनः।।
तेषामर्थे सदा विप्र प्रदाताहं प्रयत्नतः।
दामि वाच्छितं नित्यं सर्वदा सौख्यमुक्तमम्।।

‘विप्रवर! जो मानव मेरे स्वामी दयासागार करूणानिधान श्री रामचन्द्रजी के मंगलकारी नाम सदा प्रेमपूर्वक जप करते हैं, उनके लिये मैं सदा प्रयत्नपूर्वक प्रदाता बना रहता हॅूं। मैं नित्य उनकी अभिलाषा-पूर्ति करते हुए उन्हें उत्तम सुख देता रहता हॅूं।’
सारासं- श्री हनुमानजी स्वयं तो नाम कीर्तन में सदा जागरूक रहते ही हैं, अन्य कीर्तन-प्रेमियों की भी सदा रक्षा करते रहते हैं।

प्रेमीजनों को मेरा सादर- जय सियाराम। जय हनुमान।
लेखक-अनिल यादव।

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