lord hanuman
  • 1-श्री हनुमन्निवास,
  • 2-श्री हनुमानगढ़ी-पहाड़पुर,
  • 3-ज्ञानमुद्रा में श्रीहनुमान,
  • 4-दास भाव में श्रीहनुमान, व
  • 5- श्री व्यास हनुमान।
श्री हनुमान जी के भक्तों की खुशी के लिए मैं इस तरह से प्रयास करता हॅू कि श्री हनुमान जी की लीलायें उनके चमत्कार एवं स्थानों की जानकारी संग्रह करके उन तक पहुॅंचा सकूॅं जिससे आत्मकल्याण के साथ जन कल्याण भी हो सके। इसी क्रम में मैने पिछले ब्लाग में श्री हनुमानगढ़ी पर पाॅच विन्दु का आर्टीकल लिखा था। जिसे लोंगों ने खूब पसन्द किया। इस लेख में अयोध्या जी के ऐसे पाॅच स्थान का उल्लेख करने जा रहा हॅू जो कि अनोंखे श्रीहनुमान जी के स्थान हैं।
 
1- श्री हनुमन्निवास -एक ऐसा स्थान है जहाॅं पर अयोध्या के प्रसिद्ध संत श्री गोमतीदास जी निवास करते थे। यहाॅ पर प्राचीन ऋषियों की भाॅति श्री हनुमान जी के यज्ञ, अनुष्ठान, साधु सेवा बडे़-बड़े उत्सव व समैया इत्यादि समारोह हमेशा होते रहे इसलिए यह स्थान परम सिद्ध स्थान है। इस स्थान पर (आर्तजन) बहुत कष्टप्रद, दुखी व्यक्ति अर्जी (विनयपत्र) लेकर आते थे। अपनी अर्जी लगाते थे। यहाॅ के संत रात्रि में अनुष्ठान से निवृत्त होकर उस पर आज्ञा देते थे। उनके अनुसार जप आदि करने से कार्य की सिद्धी होती थी। प्रख्यात महात्मा श्री रूपकलाजी यहीं उत्तरी कोठरी में निवास करते थे। इसी बजह से अयोध्या का यह स्थान अनूठा है। इस लेख को अन्त तक जरूर पढ़िये।
 
2- श्री हनुमानगढ़ी पहाड़पुर– यह स्थान अयोध्या (फैजाबाद) में मुजफरा नाका पर स्थित है जिसे पहाड़पुर ग्राम कहते हैं। श्रीराम-रावण युद्ध के समय संजीवनी लाते समय श्री हनुमानजी के पहाड़सहित श्री भरत के समक्ष यहाॅं गिरने से इस स्मरणीय स्थान का नाम लोक में पहाड़पुर हुआ। यह अयोध्या से पाॅंच मील दूर प्रयागराज रोड़ पर अवस्थित है। सिद्ध स्थान अनूठा है।
 
3- ज्ञानमुद्रा में श्री हनुमानजी– अवध के हनुमान-बाग में पवनपुत्र का यह स्थान सुन्दरतम विग्रह रूप में प्रतिष्ठित है। श्री हनुमानजी की मूर्ति इतनी चित्ताकर्षक है कि इसके सम्मुख जाने पर फिर वहाॅं से हटने का मन नहीं करता। करूणामय अन्जनानन्दन का यह विग्रह इतना  आकर्षक है कि आपके हृदय में स्थान बना लेता है। यही कारण है कि अयोध्या में निवास करने वाले संत-महात्मा प्रायः हनुमान-बाग जाया करते हैं। इस सिद्ध विग्रह की यह विशेषता प्रत्यक्ष है। इस स्थान पर संत सेवा अनबरत चल रहीं है।  
 
4-दास-भाव में श्री हनुमानजी– जहाॅ-जहाॅ श्री रघुनाथजी का कीर्तन होता है वहाॅं-वहाॅं मस्तक पर अज्जलि बाॅंधे और नेत्रों में प्रेमाश्रु भरे राक्षसों को मारने वाले श्री हनुमानजी विराजमान रहते हैं, ऐसे मारूति को में नमन करता हॅू।
श्री राम-भक्त हनुमानजी के इस भाव यह श्री विग्रह अत्यन्त रमणीय है। दास-भाव में श्री हनुमान जी का दर्शन करके मन मुगध हो जाता है। अयोध्या के विद्वान संन्त एवं श्री हनुमान जी के प्रेमी भक्त इनके दर्शनार्थ प्रायः इस स्थान पर आते हैं। यह अदभुद मूर्ति श्री 108 स्वामी सार्वभौम स्वामी वासुदेवाचार्यजी महाराज के द्वारा स्थापित की गयी थी। यह स्थान जानकीघाट पर श्री वेदान्ती जी के मंदिर के ठीक सामने है। 
 
इस स्थान के बारे में महात्माओं का कहना है कि श्री हनुमानजी का यह विग्रह श्री रामजी से उनके विद्या प्राप्त करने की श्रद्धा-भक्तीमयी विनीत मुद्रा में है। जो भी हो लेकिन इस विग्रह की आराधना से यथाशीध्र लाभ प्राप्त होता है। 
एक ऐसा प्रसंग भी सुनने में आता है कि एक महंतजी कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गये थे। उनका यह असाध्य रोग जब किसी प्रकार दूर न हो सका, तब उन्होंने इन दास भाव के श्री हनुमानजी की श्रद्धा-भक्ति पूर्वक आराधना प्रारम्भ की। कुछ ही समय में श्री हनुमानजी प्रसन्न हो गये और महंत जी महाराज इस व्याधि से सर्वथा मुक्त गये। कृपया पूरा जरूर पढ़े।
 
5- श्री व्यास हनुमान– भगवान श्री राम जब चैदह वर्ष वनबास के वाद लौटकर अयोध्या आये और राज्यसिंहासन पर आसीन हुए। राज्य-कार्य अत्यन्त सुखपूर्वक निर्विन्घ चल रहा था। उस समय श्री भरतजी और श्री शत्रुघान जी प्रायः एकान्त उपवनमें पवनकुमार के साथ बैठकर श्री सीताराम जी की लीला-गुण-गान श्रवण किया करते थे। लीला गुणगान के वक्ता थे सकलगुणनिधान ज्ञानिनामग्रगण्य श्री राम जी के अनन्य भक्त वायुपुत्र श्री हनुमान जी। ये दोनों भाई अत्यन्त भक्तिपूर्वक पवनकमार से श्री सीताराम की मधुर एवं मनोहर लीलाओं का रहस्य आदि पूछते और श्री हनुमानजी गदगद होकर अपने कण्ठ से उन्हें प्रभु का नाम गुण और यश सुनाया करते थे। इसी भाव में मारूति की यह मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह प्रतिमा अत्यन्त मनोहर एवं विलक्षण शक्ति-सम्पन्न है। इस विग्रह के आराधना से कुछ महानुभावों ने अपनी दुर्लभ कामनाओं की पूर्ति की है और कुछ के जीवन मे ंतो अदभुद चमत्कार हुए। चमत्कार के बारे में मंदिर के विद्वान पुजारी लोगों को अक्सर सुनाया करते हैं।  
 
व्यास- वेष में मारूति का यह श्री विग्रह अयोध्या के रघुवीर नगर (रायगंज) मुहल्ले में प्रतिष्ठित है। यह मुहल्ला मणिपर्वत के निकट है। कहते हैं कि यह स्थान वही है, जहाॅ पवनपुत्र भरतदि बन्धुओं के सम्मुख भगवान् श्री राम की कथा सुनाया करते थे। श्री हनुमानजी के प्रेमी भक्त अयोध्या जाने पर इनके दर्शन करना आवश्यक समझते हैं।
 
  श्री अयोध्या के इन पाॅच स्थानों की यात्रा लेख के अन्तिम सारान्स में यही कहॅूगा कि जो भी व्यक्ति श्री हनुमान जी की आराधना सच्चे मन से करेगा तो उसके जीवन में किसी प्रकार की बाधा-रोग, कष्ट, एवं दुख नहीं रहेंगे। 
 
सभी भगवत्प्रेमियों को मेरा – सादर जय सियाराम जय हनुमान
लेखक- अनिल यादव

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